कोरोना काल में शिक्षा को लेकर माँ की चुनौतियां - by Neetu Pandey


KB Writers
शिक्षक दिवस लेखन प्रतियोगिता
प्रतियोगिता संख्या - 2

प्रतिभागी का नाम- Neetu Pandey

इक्कीसवीं सदीं में आयी वर्तमान समय की गम्भीर समस्या "कोरोना " है| सम्पूर्ण विश्व इस वैश्विक महामारी की चपेट में झुलस रहा है| हमारे सामाजिक जीवन के साथ-साथ आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, पारिवारिक जीवन सभी इस कोरोना के चक्रव्यूह में बुरी तरह फंस चुका है| चारों तरफ भय, घबराहट और व्याकुलता का माहौल छाया हुआ है| ऐसे में शैक्षिक क्षेत्र की तालाबंदी भी एक महती मुसीबत पैदा कर रही है | भारत पहले से ही शिक्षा के स्तर को लेकर परेशान है, ऐसे में लाॅकडाउन ने उसे और बडी़ विपत्ति में ढ़केल दिया है |भारत अपने लगभग 1.50 लाख स्कूलों और 260 लाख छात्रों के साथ चीन के बाद दूसरा सबसे वृहद शिक्षा हब माना जाता है | इस कोरोना काल में उच्च शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, बेसिक शिक्षा, प्रावधिक शिक्षा, व्यवसायिक शिक्षा आदि बाल विकास कार्यक्रमों के तहत दी जाने वाली सभी कक्षाएं रद्द की जा चुकीं है | शैक्षिक गतिविधियां रूक जाने से बच्चों के दैनन्दिन जीवन शैली प्रभावित हो रही थी। देर से सोना, देर तक सोना, कुछ भी समय से नहीं करना, पढ़ाई पर बिल्कुल ध्यान न देना, आदि जैसी प्रवृतियां बढ़ती जा रही थी। जाहिर सी बात है घर के अभिभावक भी बच्चों के इन व्यवहारों से खुश नहीं थे। कोरोना के खौफ के साथ-साथ बच्चों की बदलती प्रवृति भी उन्हें चिंतित कर रही थी। अब हम सभी यह समझ सकते हैं कि हमारे सामने कितना बड़ा संकट आन खड़ा हुआ है |  निसंदेह भारतीय सरकार, सरकारी और गैर-सरकारी विद्यालय अपना हर संभव प्रयास कर रहे हैं  इन विषम परिस्थितियों में शैक्षिक स्तर को पटरी पर लाने का | सभी संस्थाएँ वर्चुअल कक्षाओं और ऑनलाइन पढाई के माध्यम से छात्रों को पढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं  | विद्यालयों ने जब घर में बैठे बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से जोड़ा तब सबसे ज्यादा संतोष घर के इन्हीं अभिभावकों को हुआ। विद्यालय की समय सारिणी के तहत ही बच्चों को घर में ही पढ़ाने की शरुआत की। स्कूल के ही यूनिफार्म में बच्चे 5-6 घंटे स्मार्ट फोन या लैपटॉप के सामने बैठ कर पढाई करने लगे। अलग अलग विषयों के अलग अलग सत्र भी होने लगे। पाठ्यक्रम के अनुसार छात्रों को सीखने-सिखलाने की कोशिश फिर से शुरू हो गई।  ई-लर्निंग के माध्यम से सभी शैक्षणिक संस्थान छात्रों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं | तकनीकी रूप से कुछ व्यवधान के बावजूद बच्चों के शिक्षण को सतत क्रियाशील रखने के लिए ऑनलाइन शिक्षण पद्धति ने कोरोना संकट के निराशा भरे माहौल में एक आशा की किरण है, पर क्या ई-लर्निंग के माध्यम से सभी वर्ग के विद्यार्थियों को समान शिक्षा मिल सकती है | ऑनलाइन वर्चुअल कक्षाएं बड़े शहरों में तो सफल हो सकती है, परन्तु दूसरे और तीसरे दर्जें के शहरों में ई-लर्निंग का कामयाब होना संभव नहीं जान पड़ता | क्योंकि इन  नगरों में रहने वाले मध्यमवर्गीय और निम्नवर्गीय अभिभावकों के पास स्मार्ट फोन नहीं है और विद्यालयों में भी ई-लर्निंग की उचित व्यवस्था नहीं है | ऑनलाइन कक्षाएं तो तभी संभव होगी जब विद्यार्थियों तक शुचारू  रूप से शिक्षा पहुँचाई जाए | विद्यालयों के साथ-साथ बच्चों की शिक्षा को लेकर माँओ की समस्याएं भी बढ़ गयी है क्योंकि विश्व की किसी भी प्रकार की आपदा की मार सबसे अधिक स्त्रियों को ही झेलनी पड़ती है | 


दुनिया में जब भी कोई मुसीबत आये
सबसे पहले वह माँ से ही टकराये
माँ हर मुश्किल से लड़ कर
खुद को सबसे आगे कर कर
बच्चों की रक्षा करती है सदैव ||


इस महामारी से सबसे ज्यादा जो परेशान हैं वह हैं कच्चे मन वाले स्कूली छात्र। खासकर शहरी क्षेत्रों के स्कूली छात्र  इस मुश्किल भरे समय का फायदा उठाने वाले प्राइवेट स्कूलों के चक्कर में पड़ रहे हैं। रोज घंटों उन्हें ऑनलाइन अपने शिक्षकों के लेक्चर सुनने पड़ रहे हैं। आधुनिक शिक्षा के नाम पर हमलोगोंने जो व्यवस्था अपनाई है, उसमें प्राइवेट स्कूलों का जोर पाठ्यक्रम को पूरा करने पर रहता है तो सरकारी स्कूलों में से ज्यादातर की स्थिति दैनिक दिनचर्या के रूप में  निपटाने जैसी है। बहरहाल कोरोना संकट में दोनों ही तरह से बच्चों को लगातार ई-लर्निंग के जरिए ज्ञान की घुट्टी पिलाई जा रही है | औरत के पास पहले से ही घर, परिवार और बाहर की इतनी जिम्मेदारियां होती है कि उन्हें पूरा करने में ही उनका सारा समय निकल जाता है | ऐसे में ऑनलाइन बच्चों की पढ़ाई करवाना उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं है | बच्चों की ऑनलाइन कक्षाओं के लिए उन्हें अलग से कम से कम तीन-चार  घण्टे अलग से निकालने पड़ते हैं क्योंकि अध्यापक ऑनलाइन कक्षाओं के नाम पर कुछ एक प्रश्न-उत्तर लिखकर व्हाट्सएप पर डाल कर चले जाते हैं या फिर गूगल मीट या जूम एप पर आधे घण्टे की ऑनलाइन कक्षा लेकर विषय समझाने का प्रयास करते हैं, बीच- बीच में इन्टरनेट की समस्या होती रहती है |  इन परिस्थितियों में विद्यार्थियों का सब कुछ समझ पाना मुमकिन नहीं हो पाता | फिर माँ को भी उतनी देर बच्चों के साथ बैठ कर ऑनलाइन कक्षा करनी पड़ती है और उसे समझना भी पड़ता है  और प्रत्येक प्रश्न को बच्चे को विस्तार से समझाना भी पड़ता है | उस पर भी कुछ बच्चे आसानी से समझ जाते हैं पर कुछ तो ऑनलाइन कक्षा करने को तैयार ही नहीं होते | ऐसे माँओ की समस्याएं और भी बढ़ जाती है | फिर भी वे कोशिश करती रहती है क्योंकि चाहे दुनिया के स्कूल बन्द हो जाए पर  मां की पाठशाला कभी बंद नहीं होती |

आया फिर कोरोना एक संकट बनकर 
हाहाकार मचाकर उसने
शिक्षा का स्रोत किया है बंद
किंतु माँ की पाठशाला को
कर न पाया वो भी बंद
चाहे कितनी भी मुश्किल हो
अनवरत अन्तकाल तक चलती रहती
माँ की पाठशाला ||


ऑनलाइन शिक्षा पद्धति को लेकर निम्न वर्गीय महिलाओं को अधिक समस्या का सामना करना पड़ता रहा है | क्योंकि वो अधिक पढ़ी- लिखी नहीं होती | फिर उनके बच्चों की शिक्षा का क्या? जो ऑनलाइन शिक्षा का मतलब भी नहीं जानते | मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग की औरते इतनी अप- टू- डेट  भी नही होती कि वे अपने बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा के लिए पूरी तरह से तैयार कर सके | इस वजह से उनका अधिकतर समय उसे समझने में ही चला जाता है | अब इसके लिए अभिभावकों को समय निकालना पड़ रहा है। जब लाॅकडाउन था तब अभिभावकों के पास समय था तो वे बच्चों को समय दे पाते थे,  परंतु अब जबकि पूरा देश खुल चुका है और अभिभावकों के लिए कई तरह की व्यावसायिक समस्याएं चुनौतियों के रूप में दस्तक दे रही है ऐसे में, बच्चों के लिए अलग से समय निकालना निश्चित ही मुश्किल होगा | अध्यापक भी इस  नयी तकनीक को लेकर अभ्यस्त नहीं है | इसीलिए बच्चों और औरतों को बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है | ई-लर्निंग को लेकर माँओं की जो सबसे बड़ी परेशानी है वह उनके बच्चों की सेहत | जिस मोबाइल से हम सदैव बच्चों को दूर रहने की हिदायत देते रहते थे | आज ज़बरन हम उन्हें फोन के साथ ही बैठाये रहते हैं | जिसका सीधा असर बच्चों की सेहत पर पड़ता है | इस नयी तकनीक की वजह से बच्चों के विकास की गति पर भी असर पड़ रहा है | इससे बच्चों को कुछ शारीरिक व मानसिक परेशानियां हो सकती है। सर दर्द, आंखों में दर्द, नींद का ठीक से नहीं आना, चिड़चिडापन, एकाग्रता में कमी, उदासीनता, जैसी परेशानियां बच्चों में हो सकती है। डॉक्टरों के अनुसार अगर ऑनलाइन शिक्षा में सावधानी का ख्याल नहीं रखा गया तो बच्चों को सर्वाइकल जैसी अप्रत्याशित बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। कोरोना की वजह से पनपी इस नयी परिस्थिति में औरतों को हर मोड़ पर नयी - नयी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है | इस संकट भरे समय में सरकार और विद्यालय की तरफ से फीस को लेकर भी किसी प्रकार की रियायत नहीं मिल पा रही है | मध्यमवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवारों की स्थिति इस आपातकालीन समय में बहुत ही चिंताजनक बनी हुई है | ऐसे में ऑनलाइन कक्षाएं करा कर उसकी फीस जमा कर पाना उनके लिए असंभव हो रहा है |  इन परिस्थितियों से अभिभावक भी डरे हुए हैं, लिहाजा वे स्कूलों से बचना चाहते हैं। इन भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में उन विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करना आसान हो जाएगा जो अच्छे, महंगे गैजेट्स का उपयोग कर सकते हैं और जो अच्छे या बड़े शहरों से आते हैं जहां नेटवर्क की सुविधा बेहतर होती है। इस तरह से यह सहज ही देखा जा सकता है कि शिक्षा प्राप्त करने के मूलभूत समान अवसर से एक बड़ा समूह वंचित रह जाएगा। इन स्थितियों में शैक्षणिक दृष्टि से असमानता बढ़ती जाएगी जो विद्या अर्जित करने वाले एक बड़े समूह में असंतोष का कारण भी बन सकता है इसीलिए सोशल मीडिया पर पढ़े- लिखे अभिभावक एक अभियान भी चल रहा है, जिसमें कहा जा रहा है कि यदि ये सत्र शून्य कर दिया जाए तो बहुत नुकसान नहीं होगा। इसके बावजूद एक बड़ा तबका ऐसा भी है, जो चाहता है कि ऑनलाइन कक्षाओं के माध्यम से ही बच्चों की पढ़ाई चलती रहे। आर्थिक और भौतिक आधार पर जिंदगी के मूल्यों का हिसाब लगाने वाली सोच को यह शायद ही स्वीकार्य हो कि बच्चों का कोरोना के चलते एक वर्ष बर्बाद हो जाए। यही सोच प्राइवेट स्कूलों के लिए कोरोना संकट के दौर अवसर बनकर सामने आई है। प्राइवेट स्कूलों की इस सोच की वजह से सरकारी शिक्षा तंत्र अपनी जिम्मेदारी को येन-केन प्रकारेण निपटाने के दबाव में है|  आरंभ में ऐसा लगा कि थोड़े ही दिनों की बात है और हालात जल्द ही सामान्य होंगे और तब तक के लिए घरों में कैद बच्चों के लिए ऑनलाइन शिक्षा को प्रयोग के तौर पर अपनाया जा सकता है। परंतु आज जब यह सर्व विदित है कि कोरोना लंबे वक्त तक हमारे साथ रहने वाला है, तो ऑनलाइन शिक्षा को लेकर एक गंभीर विमर्श की जरूरत है। एक जैसी शिक्षा की सर्व-सुलभता , बच्चों के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य की चिंता, निजता व शांति के साथ पढ़ाई जैसी चुनोतियों को समझकर इनका समाधान कर के ही ऑनलाइन शिक्षा का सर्वोत्तम लाभ उठाया जा सकता है। किसी प्रकार कुछ अभिभावक इस ऑनलाइन शिक्षा से जुड़े हुए भी है तो इस प्रकार दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता की क्या गारंटी है | सभ्य समाज की बुनियाद सबल शिक्षा प्रणाली मानी जाती है | जब तक शिक्षा प्रणाली की बुनियाद ही मजबूत न हो, तब तक उस शिक्षा का कोई अर्थ नहीं होता | पढ़ाई के लिए बच्चों का शारीरिक और मानसिक मिलन बहुत ही आवश्यक है। चंचलता, रचनात्मकता और कई अन्य चीजें कभी भी ऑनलाइन शिक्षा से बच्चों में नहीं आ सकती है। बच्चे अपने विद्यालय में शिक्षकों के सानिध्य और परिवेश मेंजितना सीखते हैं,  सभी समस्याओं पर वर्तमान सरकार को सभी वर्गों को ध्यान में रखते हुए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है | क्योंकि सवाल देश के नौनिहालों की बुनियाद का है, जो हमारा भविष्य है | यदि हमारा वर्तमान ही कमजोर होगा तो भविष्य कहा से मजबूत बन पायेगा |

 

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