शहीद की दुल्हन - by Saurabh Snehi
शहीद की दुल्हन
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लहू के रंग से आज,
तिरंगा को नहलाया है।
तिरंगा में लिपटा पिया,
घर की चौखट पर आया है।
हिंद के दुश्मनों से लड़ने में,
खुद को आज वह खोया है।
सीमा पर जगा था बहुत दिनों से,
अब, गहरी नींद में सोया है।
आज मैं सुहागन हुई हूँ ,
वह जंग जीत कर आया है।
गहरे जख्म के खून से फिर से,
मेरी मांघ वह भरने को...।
हाथों में मेहंदी, माथे पर बिंदी,
आज, उन्हीं के लिए सजाया है।
सारे वतन को समेट पिया,
ताबूत में भरकर लाया है।
देश के हर कसमों की खातिर,
सब कसमें वादे तोड़ा है,
अपने सात वचनों को तोड़कर,
यह तिरंगा ओढ़ा है।
मैं, शहीद की दुल्हन हूँ,
मेरी, एक इच्छा पूरी कर दो।
मेरे सोलह सिंगार के बदले में,
जो तिरंगा लिपटा है उनसे,
उसे मेरे सर पर रख दो।
हमें, और कुछ की जरुरत नहीं,
बस वही तिरंगा भाया है।
तिरंगा में लिपटा पिया,
घर की चौखट पर आया है...।
- सौरभ स्नेही
पूर्णियाँ (बिहार)


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