जय हो गणेश - by Girish Chandra Ojha "Indra"


जय हो गणेश

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हे  प्रथम  पूज्य , सब   देवों में  ,

मुनियों  में , मनुजों  में वरेण्य  ।

नागों में , असुरों  -  यक्षों    मे ,

सचराचर  के , शुभदा शरेण्य ।।


कुछ कृपा - कोर , कर दो स्वामी !

जीवन - धन  , सुफल हमारा हो ।

पर उपकारी , संस्कृति  संयुत   ,

सेवक मन सजल , हमारा    हो ।।


नलिनी  कामुकी ,    वामरोमी ।

विश्वादि  जनन, कीलक स्वाहा।

उच्छिष्ट  गणेश ! अये    वरदे  !

अमृताब्धिकृतावासी   स्वाहा ।।


अनपाय  अनन्त, अनविल हो,

अच्युत  अक्षर , अमृत प्रतिरथ।

अक्षय अजेय  , अप्रतर्क्यी हो ।

प्रमितानन  , पीठाधार  सुरथ ।।


हे इंद्रगोप  ,     श्रीरिन्द्दृनील   !

सम द्युतिधारी , हे  इदाभाग  !

इछ्वाकुविघ्न  विध्वन्शी   हे  !

इति कर्तव्यी  ,  हे   महाभाग ।।


ईशान मौलि  ,  इशानी   प्रभु  !

ईशान - पुत्र  , इति के स्वामी ।

ईषणात्रयी   ,   कल्पान्तमयी ।

हे इहामात्र  ,   वर्जित - नामी।।


देवों के देव ,   सुरेश्चर     हे  !

सबसे पहले ,  पूजे    जाते ।

गिरिजा के सुवन, गणेश्चर हे !

दुख - भार जगत,   लेे जाते।।


दे रिद्धि सिद्धि , जगती - तल को ,

प्रभु ! फूले नहीं ,     समाते   हो !

सचराचर के , मन - मानस   में ,

अपने मन हुए  ,   अमाते   हो ।।


- गिरीश चन्द्र ओझा "इन्द्र''

आजमगढ़, उत्तर प्रदेश

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