मैले तारे - by Sunita Bhatt Goja


मैले तारे 

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सड़क किनारे टहल रहे थे टिमटिमाते तारे।

मैले थे, पर मासूम थे लगते थे वे प्यारे।

आँखें सुंदर गोल-गोल थी, पर थी लगती नीरस,

सपने उनमें अनगिनत थे पर बिखरे हुए थे सारे।

लिखने-पढ़ने का बोध नहीं था, खेलकूद का समय नहीं था।

बोझा ढोते, कचरा बिनते, राह पर अपनी चलते थे बेचारे। 

बिखरे बाल, फटे होंठ थे, होठों पर मुस्कान धरी थी ,

खाली पेट, पेट की खातिर दौड़ रहे थे सारे।

सर्दी सहते, गर्मी खाते, खोफ था ठेकेदारों का,

कुछ टुकड़ों की खातिर उनके चुंगल में थे सारे।

ख्वाहिशें असंख्य पर दबी-दबी,

पूरी होने की ना थी आस कभी, 

झोली में थे लेकर चलते फिर भी हँसी के पिटारे।

खुले आसमान तले चांद को बढ़ता देख रहे थे,

आशा की एक चादर ताने सो रहे थे न्यारे।

पूछूँ मैं देश से अपने, देश के सत्ताधारों से,

दिशाहीन बचपन को क्या दिशा देंगी ये सरकारें?


 - सुनीता भट्ट गोजा

जम्मू, जम्मू-कश्मीर

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