महल बस अपनी गाते हैं - by Vijay Kumar Tiwari "Vishu"
महल बस अपनी गाते हैं
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झोपड़ियों के रक्त बहाकर महल बनाते हैं,
कौन दर्द समझेगा इनकी क्यूँ अश्रु बनाते हैं,
झोपड़ियों की कौन सुने ये कब कह पाते हैं,
अपनी धुन में मस्त महल बस अपनी गाते हैं।।
रूक ही जाते कदम सदा महलों के द्वारों पे,
उपहास उड़ाए जाते हैं महलों के चौबारों पे,
शान हैं ऊँचे महलों की ऊँची इसकी दवारें,
खड़ा देख लाचार झोंपड़ी नीचे कौन निहारे,
बिखरे अरमानों के तिनके सपने मर जाते हैं,
अपनी धुन में मस्त महल बस अपनी गाते हैं।।
कब गरीब के व्यथा सुने हैं महलों ने बतलाओ,
अँधी होती हैं दीवारें झोपड़ियों को समझाओ,
आलीशान हैं ठाट बाट कैसे ये दर्द को जाने,
उच्चमहत्वाकांक्षी हैं दुख इनको नहीं सुनाओ,
महलों में इन झोपड़ियों के सपने रौंदे जाते हैं,
अपनी धुन में मस्त महल बस अपनी गाते हैं।।
कितनी अबलाओं के आँसू सूख गए महलों में,
कितनी बालाओं के दामन को रौंदा महलों ने,
कौन सुनेगा चीखें इनकी कहाँ कान महलों के,
दब जाती आवाज यहाँ परकोटों की गलियों में,
सिंहासन भी देख गरीबी रौब जमाते हैं,
अपनी धुन में मस्त महल बस अपनी गाते हैं।।
राजमहल के गलियारों की अद्भुत बनी कहानी,
झोपड़ियों की प्यास बुझे ना ले आँखों में पानी,
कर दे देकर कर्ज में रहते खोते यूँ ही जवानी,
कर लेकर मदिरा छलकाते महलों में राजा रानी,
खुद के वैभव लिखने को सच को झुठलाते हैं,
अपनी धुन में मस्त महल बस अपनी गाते हैं।।
रक्त बहाए प्रजा ने अपनी नाम हुए महलों के,
झोपड़ियों के जलने से ख्वाब सजे महलों के,
साज बजे छनके पायल महलों के रंगमहल में,
कहीं पे नम पलकें होंगी झोपड़ियों की रातों में,
महल कभी ना झोपड़ियों को गले लगाते हैं,
अपनी धुन में मस्त महल बस अपनी गाते हैं।।
देख अमीरी अक्सर दिखती अहंकार में डूबी,
शोषित दलित गरीबी हरपल कर्जे से ही ऊबी,
साजिश उन महलों की है बाँटो झोपड़ियों को,
स्वाभिमान को ठोकर मारो रोती रहे गरीबी,
रिसते जख्मों पर हरपल ये नमक लगाते हैं
अपनी धुन में मस्त महल बस अपनी गाते हैं।।
- विजय कुमार तिवारी "विशु"
गोरखपुर, राजस्थान
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