बाजार - by Nita Sharma


बाजार

 -

भीड़ लगी बाजारों में

सामान बिक रहा है।


उम्मीद बिक रही है,

लाचारी बिक रही है,

गरीबी में गरीबों का

अरमान बिक रहा है।।


लहू बिक रहा है,

पानी बिक रहा है,

आँखे, किडनी, दिल और 

प्राण बिक रहा है।।


डिग्री बिक रही है,

भाषा बिक रही है,

माँ शारदे की विद्या 

और ज्ञान बिक रहा है।।


धर्म बिक रहा है, 

जाति बिक रही है,

मंदिरों-मस्जिदों में

भगवान बिक रहा है।।


नायक बिक रहे हैं, 

नेता बिक रहें हैं,

अन्नदाता कहलाने वाला

किसान बिक रहा है।।


शर्म बिक रही है, 

लाज बिक रही है,

नारी की अस्मिता और 

स्वाभिमान बिक रहा है।।


सत्य बिक रहा है, 

झूठ बिक रहा है,

कचहरी में गीता और 

कुरान बिक रहा है।।


जमीन बिक रही है,

आसमान बिक रहा है,

लाशों के ढेर से 

शमशान बिक रहा है।।


मुफ्त में गड़े थे जो 

पुतले भगवान ने,

इंसानों के बाज़ार में

इंसान बिक रहा है।।

 

- नीता शर्मा

शिलांग, मेघालय

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