कविता की यात्रा - by Babita mandhana


कविता की यात्रा

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सुख-दुख की चाहे जो मात्रा,

कविता करती अपनी यात्रा।


दर्द मिले तो अक्षर रोते,

आँसू बहकर ह्रदय भिगोते।


मिट्टी की सुगंध से सुरभित,

जुड़कर सबसे करती पुलकित।


धरती की बेटी है कविता,

बहती जैसे पावन सरिता।


पर्वत की तरह अटल रहती,

अपने प्रवाह में है बहती।


इसके अंदर गहरा सागर,

डूबे पाए मोती-गागर।


तुझमें सागर की गहराई,

रत्नो की निधि संग समाई।


उड़ती पतंग-सी नील गगन,

बाँधे डोरी में मन मगन।


गुलाब जूही जैसे महके,

कोयल बुलबुल जैसी चहके।


सहकर मौसम भीषण-प्रहार,

करती जग में घृणा-संहार।


बन जीवन की मीठी सरगम,

दूर भगाती मानव के गम।


सच की ये सतत पालनहार,

पढ़कर पाए सुखी संसार।


लेखन झाँके भिन्न आकार,

अभिव्यक्ति मन भाव साकार।


शब्द सजाते सुन्दर मेला,

देखें मोहित रूप अलबेला।


छंद-अलंकार से जब सजती,

स्वर-लहरियाँ मीठी बजती।


भाव पगडंडियों से जाए,

हर क्षण हिचकोले खाए।


तुलसी, मीरा पद  गाए,

भक्ति संदेश जगत हर्षाए।


भारत का आजादी दर्पण,

शहीद करते प्राण समर्पण।


अंतरिक्ष में कल्पना चावला,

गढ़ती नारी शक्ति मलाला।


जन मानस को जब मन भाती,

स्थान जगत में कविता पाती।


- बबीता माँधणा

हावड़ा, पश्चिम बंगाल

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