विडंबना - by J. P. Dimri
विडंबना
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कितनी हीं हों रातें काली,
भोर सुहानी आती हैं।
पर ऐंसे जीवन भी हैं,
जहाँ रात अटल रह जाती है।
काल-चक्र के पहियों की,
जाने कब नियति बदलना हो।
पौ फटने से पहले ही,
साँसों की गति थम जाती है।
बरखा के बाद हरी होगी,
सारी वसुधा मुश्काएगी।
सावन में प्यास पपीहे की,
फिर भी प्यासी रह जाती है।
स्वाति-नखत की दो बूँदें,
कब टपकेगी, ईश्वर जाने।
पानी-पानी, करते-करते,
जीवन संध्या हो जाती है।
भू-चक्र बहुत नमः मंडल में,
कोई तो ग्रह शुभता लाए।
महादशा ढ़लते-ढ़लते,
साढ़ेसाती चढ़ जाती है ।
पूरनमासी तो जीवन का,
थोड़ा अंधियारा टालेगी।
किस्मत का ग्रहण राहू- केत,
युति कालसर्प बन जाती है।
- जे० पी० डिमरी
दिल्ली
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