कोख का मान - by Rupali Singh



रामपुर  बाग के सीता भवन  कि छटा आज देखते ही बन रही थी । गेंदे और  आम के पत्तो की मालाओं और बिजली की लड़ियों से सजा भवन अत्यंत ही सुंदर लग रहा था । भवन के अंदर ढोलक और मंजीरों पर होते मंगलगान और बाहर देसी घी में बनते पकवान  , वातावरण मे खुशी बिखेर रहे थे। दावत की सारी तैयारियां  जोरों शोरों पर थीं -- भई , मौका ही कुछ ऐसा था , आज रामप्रसाद वकील साहब के यहाँ उनके बेटे का जनमोत्स्व था , इस दिन का वो  पिछले पंद्रह वर्षो से  इंतज़ार  कर रहे थे। बेटे को पाकर वकील साहब फूले न समा रहे थे ..... कहते "आ गया मेरे खानदान का चिराग देखना एक दिन मेरा नाम रोशन करेगा । सारी मुरादों और तमनाओ  का पूरा होने वाला दिन है आज ।"


वैसे , यह बेटा रामप्रसाद जी की तीसरी संतान थी , इस से पहले उनके दो बेटियां रिद्धि और सिद्धि  जो कि बहुत समझदार, खूबसूरत और तेजस्वी थीं। परंतु रामप्रसाद जी बेटीयों को बिलकुल पसंद नहीं करते थे , वे अक्सर उन्हें झिडकते रहते , उन्हें परिवार पर भोज समझते और घृणित दृष्टि से देखते थे । बच्चियों के दिलो में भी बाप का ख़ौफ बैठ गया था । उन्हें अपना लड़की होने का दोष समझ नहीं आता था। यही नही ,बेटा न होने पर वकील साहब अपनी पत्नी उमा को भी बहुत प्रताडित करते थे और कभी कभी तो उन्हें बुरा भला कह कर घर से निकाल देते थे । बाद मे बड़ो के समझाने पर मामला शांत होता ।


खैर , बेटा न होने तक यह तमाशा आम था , आज तो खुशी का मौका था, बेटे का नामकरण संस्कार था। बेटे का नाम "यश" रखा गया .... खूब दान -पुण्य किया गया। रिद्धि और सिद्धि भी भाई को पाकर बहुत खुश थीं , घर के बाहर आकर मुह उठाये घर  की सजावट देख रही थीं और खुश हो रहीं थीं । 


समय बीतने लगा... उमा अक्सर अपनी दोनों बेटियों रिद्धि और सिद्धि को समझाती  कि "बेटा खूब मेहनत से पढ़ाई करके समाज  मे ऊँचा स्थान प्राप्त करना  , केवल लगन और परिश्रम से  किस्मत को बदला जा सकता है । सफलता की उस ऊचाई पर पहुँचो कि सारी कमियॉ बौनी रह जायें, और याद रखना कि शिखर पर वही पहुँचता है जो जुनून के साथ मंजिल को पाने की तमन्ना दिल मे रखता है।  "बेटियाँ भी  किसी से कम नहीं होती , यह साबित कर दो , वे भी खानदान का नाम रोशन कर सकती हैं। आसमान में सफलता का परचम लहराकर गर्व से सिर उठा कर चल सकती हैं। वादा करो तुम दोनों खूब महेनत करोगी और सफलता प्राप्त करोगी । 


अब , दोंनो बच्चियों  ने अपनी माँ की बातो का सार समझ लिया था , उन्हें समझ आ गया था कि केवल मेहनत से ही किस्मत को बदला जा सकता हैं। दोनों ने जमकर पढ़ाई करी और अच्छे अंको से कक्षाओं मे पास होती गयीं। पोस्टग्रेजुएशन मे दोनो ने गोल्डमेडल    लिया । उसके बाद दोनों बहने पी.सी.एस  की तैयारी मे जुट गयीं। दो तीन साल की कड़ी महेनत के बाद रिद्धि ने उत्तराखंड पी.सी. एस में दसवाँ स्थान प्राप्त किया और सिद्धि ने उत्तरप्रदेश पी.सी. एस  की सब- ऑर्डिनेट परिक्षा  क्वालीफाई कर सफलता प्राप्त की ।


रिजल्ट आते ही  मोहल्ले के सभी लोग वकील साहब को बधाई देने के लिए आने लगे .....कहते ..... बेटियों ने तो खानदान का नाम रौशन कर दिया उनकी मेहनत रंग लाई । वकील साहब सीना चौड़ा कर कहते , आखिरकार बच्चियां किसकी हैं और यह कहकर रिद्धि और सिद्धि के साथ प्रेस वालो  से फ़ोटो खीचवाये और बोले मेरी बेटियां मेरा गर्व हैं मेरा अभिमान हैं ।


तीन साल बाद फिर रामपुर बाघ का सीता भवन गेंदे की मालाओं और बिजली की झालरों से सजाया गया । भवन के अंदर से मंगलगान गूंज रहे थे , देसी घी मे बनते पकवान वातावरण मे सुगंध बिखेर रहे थे पर आज यह सब तैयारियां रिद्धि की विदाई के लिए हो रही थीं उसकी शादी उसके सहयोगी अमित के साथ हो रही थी जो की स्वम एक पी. सी. एस अधिकारी थे ।


विदाई के समय उमा की आँखे नम थीं पर दिल मे इस बात की खुशी भी थी कि बेटीयों ने उसकी कोख का मान रखा और कठिन परिश्रम सफलता प्राप्त कर लड़की होने के कलंक को मिटा दिया था ।


Writer:- Rupali Singh

From:- Bareilly, U.P. (India)

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