नसीब का खेल - by Ragini Singh

                                                               

मिडिल क्लास के बच्चों के बीच हुई वो छोटी सी अनबन आज अवनी के लिये जानलेवा साबित होने वाला था। बात उन दिनों की है जब अवनी कन्या बालिका विद्यालय में सातवीं कक्षा की छात्रा हुआ करती थी अवनी पहली कक्षा से उसी स्कूल में पढ़ती थी  इसलिए वहाँ के वातावरण से पूरी तरह वाकिफ़ थी गीत संगीत के साथ - साथ  पढाई में भी उसका कोई सानी नहीं था इसलिए विद्यालय के शिक्षक –शिक्षिकाओं की नज़रों  में वो अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखती थी कक्षा के सभी बच्चों से उसकी गहरी आत्मीयता थी


सातवीं कक्षा का सत्र शुरू ही हुआ था ,एक दिन हमलोग मुखर्जी मैडम की इंग्लिश की क्लास अटेंड कर रहे थे, उसी समय एक दुबली पतली सांवली सी लड़की दरवाजे पर आकर खडी हो गयी और मैडम से अंदर आने की इजाजत मांग रही थीI मैडम ने ‘कम इन’ कहकर उसे इशारे से अंदर बुला लिया और एक खाली  सीट की तरफ देखकर बैठने का इशारा किया लेक्चर के बीच ही उन्होंने उसका पूरा परिचय पूछ लिया अवनी के चेहरे से देखकर ये लग रहा था कि वो लड़की ....यानि सुरुचि ...हाँ शायद यही नाम था उसका, उसे ज्यादा पसंद नहीं आई थी अवनी को सांवले रंग से बहुत चिढ़ थी.. उसे लगता था सांवला रंग होना एक अभिशाप है लड़कियों के लिये और उससे भी बढ़कर ये कि वो लड़की बिलकुल साधारण सी वेशभूषा में थी


कुछ दिनों के पश्चात कक्षा शिक्षिका ने क्लास का सीटिंग अरेंजमेंट बदल दिया, और इस बार संयोगवश अवनी की सीट सुरुचि के साथ कर दी गयी अवनी कभी भी सुरुचि के साथ बैठना नहीं चाहती थी लेकिन उसे पता था कि शुक्ला मैडम कभी भी उसकी बात नहीं मानेगी इसलिए उसने दिल पर पत्थर रख कर सुरुचि के साथ बैठने का निर्णय लिया अवनी और सुरुचि के बीच दुश्मनी की कहानी उसी दिन से शुरू हो गयी थी अवनी सुरुचि को अपमानित करने का कोई भी मौका नहीं छोडती थी, यहाँ तक की शिक्षक –शिक्षिकाओं से भी वह सुरुचि की शिकायत करने लगी। हाँलाकि सुरुचि पढ़ने में अच्छी थी पर उसकी गरीबी उसकी अच्छाइयों की राह में बाधा बन रही थी। सुरुचि के पिता शहर में रिक्शा चला कर किसी तरह अपने परिवार का भरण पोषण कर पाते थे। कभी कभी सुरुचि स्कूल फीस समय पर जमा नहीं कर पाती थी, तो कभी असाइनमेंट जमा नहीं हो पाता था टीचर्स भी सुरुचि से नाराज रहने लगे थे क्योंकि उसका कोई भी काम समय पर पूरा नहीं हो पाता था। सभी सुरुचि के ऊपर अपना गुस्सा निकाल लेते थे लेकिन वो कभी भी किसी के सामने अपना पक्ष नहीं रख पाती थी मुझे सुरुचि से हमदर्दी थी लेकिन अवनी नाराज हो जाएगी ये सोचकर मैं कभी भी उसकी तरफ हमदर्दी का हाथ नहीं बढा पायी।


एक दिन तो अवनी ने सब्र की सारी सीमाओं को तोड़ दिया था हुआ यूँ कि एक लड़की ने अवनी के कहने पर कक्षा शिक्षिका से शिकायत कर दी कि सुरुचि ने उसकी साइंस की किताब चुरा ली है। कक्षा शिक्षिका ने सच्चाई का पता लगाने की जिम्मेदारी अवनी को दे दी बस फिर क्या था अवनि ने उस दिन अपनी पूरी भड़ास निकाल ली


पूरी कक्षा के सामने उसे चोर कहकर अपमानित किया गया बोर्ड पर बड़े बड़े अक्षरों में... सुरुचि चोर है...लिखा गया सुरुचि बस रोती रही और अपनी सफाई में कुछ नहीं कह पाई देखते – देखते साल निकल गया अगले ही साल अवनी के पिता, जो कि डॉक्टर थे, का तबादला दूसरे शहर में हो गया। अवनि को सुरुचि से इतनी नफरत थी कि जाते समय भी उसने सुरुचि से कोई बात नहीं की

 

अवनी के जाने के बाद भी मै उसके संपर्क में बनी रही ऐसे ही कई वर्ष बीत गए हम लोगों ने १२वी का इम्तिहान दिया और सभी एक दूसरे से बिछड़ गए सुरुचि अंतर्मुखी स्वभाव की थी इसलिए उसका किसी से भी कोई संपर्क नहीं रहा १२वी का परिणाम आने पर पता चला था कि सुरुचि बहुत अच्छे अंक से पास हुई थी सबने अलग अलग कॉलेज में दाखिला ले लिया और जिन्दगी की दौड़ में अलग अलग रास्तों पर निकल गए


स्नातक करने के बाद अवनी की शादी हो गयी। सर्विस में उसकी कोई रूचि नहीं थी इसलिए उसने ख़ुशी - ख़ुशी शादी के लिये अपनी सहमति दे दी। मेरी आगे की पढाई बिना किसी बाधा के निरंतर चलती रही। मुझे घर द्वार किटी पार्टी इन सबमें कोई रूचि नहीं थी। मै पढाई पूरी कर शासकीय सेवा के लिये प्रयासरत थी। जगह जगह आवेदन और साक्षात्कार का सिलसिला जारी था। अवनी से कभी कभार फ़ोन पर बातचीत हो जाती थी। वो अपनी जिन्दगी में काफी खुश थी। रोज सहेलियों के साथ शापिंग, पिकनिक, पार्टी इत्यादि में उसका समय काफी अच्छे से व्यतीत हो रहा था ईशान अवनी  के पति भी काफी खुशमिजाज़ थे और अवनी का काफी ख्याल रखते थे। अवनी से ही पता चला था कि ईशान की पोस्टिंग उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में थी। जहाँ वो उप जिलाध्यक्ष के पद पर कार्यरत थे। इसी बीच मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के द्वारा आयोजित सहायक प्राध्यापक की परीक्षा में मेरा चयन हो गया ....मै बेसब्री से अपनी पदस्थापना की प्रतीक्षा करने लगी। लगभग एक महीना इंतज़ार करने के बाद आखिर वो दिन आ गया जिसका मुझे लम्बे समय से इंतज़ार था। मध्य प्रदेश के भिंड जिले के शासकीय कॉलेज में मुझे नियुक्त किया गया था। अब तो मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था। एक तो नयी नौकरी का उत्साह और दूसरे अपनी बचपन की दोस्त अवनी से मिलने और उसके सानिध्य में रहने की तमन्ना जब अवनी को ये पता चला कि मै भिंड आ रही हूँ, वो तो ख़ुशी के मारे जैसे पागल ही हो गयी थी। हम दोनों ने कितनी सारी योजनायें बना ली घुमने फिरने की। अवनी ने सख्त हिदायत दी थी कि तुम मेरे यहाँ ही ठहरोगी। मेरे पास और कोई चारा भी नहीं था। मम्मी पापा भी खुश थे और उन्हें बेटी को दूर भेजने की कोई चिंता नहीं थी। 


नियत दिन और समय पर मै इटावा पहुँच गयी। अवनी और ईशान दोनों मुझे स्टेशन पर लेने आये। उस रात देर तक हमलोग बाते करके पुराने दिनों की याद ताज़ा करते रहे। अगले दिन रविवार था, सोमवार को मुझे कॉलेज पहुंचना था। रविवार का दिन पूरी तैयारी में निकल गया। अवनि न जाने क्या क्या व्यवस्था करती रही मेरे लिये।

अवनी की जिद्द के कारण ईशान ने ऑफिस से सोमवार की छुट्टी ले ली और दोनों मुझे अपनी शासकीय वाहन से भिंड तक छोड़ने आये। कैंपस के अतिथि गृह में छोड़ कर वो दोनों वापस इटावा चले गएi दो महीने लगभग गुजर गए... अवनी से मेरी फ़ोन पर बातचीत चलती रही और वही से पता चला की ईशान आजकल काफी व्यस्त हो गया है इसीलिए वो मुझसे मिलने नहीं आ पा रही है। अप्रैल से लेकर जुलाई तक का महीना तबादले और ट्रान्सफर का होता है। अवनी से ही पता चला की जिलाध्यक्ष के पद पर कोई राकेश सूद की नियुक्ति हुई है। अपने काम में वो काफी सख्त हैं।


एक दिन वार्षिक परीक्षाओं के निरिक्षण के दौरान अचानक अवनी का फ़ोन आया....वो काफी घबराई हुई सी लग रही थी....उसकी आवाज से ऐसा लग रहा था मानो बस अब रोने ही वाली है। मैंने बहुत पूछा कि क्या हुआ लेकिन वो बताने की स्थिति में नहीं थी। बस एक ही रट लगाये हुई थी कि तू आ जा ... जितनी जल्दी हो सके। मेरे लिये एकदम से निकलना संभव नहीं था...किसी तरह प्रिंसिपल से कहने पर २ दिन की छुट्टी मिल पाईi मै उसी दिन शाम को बस से इटावा के लिये निकल पड़ी। वहाँ पहुँचते- पहुँचते रात के १० बज चुके थे। हालाँकि अवनी अपने ड्राईवर के साथ वहाँ खड़ी थी। जैसे ही मैं गाड़ी में बैठी, मैंने पूछा अब बता क्या हुआi वो बोली घर चल सब बताउंगी। ये क्या! रात के १० बज चुके और ईशान अभी तक घर नहीं पहुँचा, क्या बात है ....तुम लोगों की लड़ाई तो नहीं हुई या कोई और बात हैं। अब तक तो मैं भी घबरा गयी थी। किसी अनिष्ट की आशंका से मेरा मन घबरा रहा था। शांत होकर अवनी जब पास बैठी तो बताने लगी की सोमी तुझे याद हैं सुरुचि....सुरुचि मैंने दिमाग पर जोर डालते हुए पूछा कौन सुरुचि? अरे वो जो अपने साथ ७वी कक्षा में पढ़ती थी....तबतक मेरे जेहन में भी उसका चेहरा प्रतिबिंबित हो चुका था। हाँ बता न, क्या हुआ उसका क्या वो तुझे सपने में दिखाई दी? नहीं रे ....पता हैं वो ईशान के बॉस मि. सूद की पत्नी है और खुद भी आईएएस है....यहाँ नगर पंचायत में सी ई ओ के पद पर ज्वाइन करने वाली हैं। अब क्या होगा सोमी… अब तो वो ईशान से एक एक करके बदला लेगी। मैंने एकदम से उससे पूछा लेकिन तुझे कैसे पता, तू उससे कहाँ मिली? उसने रुआंसी होते हुए बताया कि ईशान काफी सोशल किस्म का इंसान है...ये लोग चुकी नए आये थे तो ईशान ने मुझे कहा कि कलेक्टर साहब को डिनर पर बुलाना है। रविवार को एक अच्छा सा डिनर तैयार कर लो...मि. एंड मिसेज सूद को डिनर पर आमंत्रित किया है मैंने। मैंने भी उस दिन डिनर की बहुत अच्छे से तैयारी की थी लेकिन मिसेज सूद को देखते ही मेरे तो होश उड़ गए थे। बड़ी मुश्किलसे मैंने अपने आपको संभाला था उस दिन। अब वो पहले जैसी सुरुचि नहीं है। काफी तेज तर्रार दिख रही है वो। मैंने उसे बहलाने का प्रयास किया ...अवनी  तू तो बस यूँ ही डर रही है......क्या उसने तुझे पहचाना ....कहीं तुझे कोई भ्रम तो नहीं हुआ? उसने आँखें तरेरते हुए बताया....पहचाना? उसने तो मुझे देखते ही पहचान लिया...जैसे वो मुझे इतने सालों बाद नहीं... कल ही देखा होi उसने तो ढंग से खाना भी नहीं खाया... हर चीज में नुक्स निकालती रही। मैंने तो बहुत अच्छे से तैयारी की थी। हालाँकि उसने ईशान को कुछ नहीं बताया। ईशान को केवल हिदायतें देती रही...कि आपके ऑफिस में ठीक ढंग से काम नहीं चल रहा हैं। आप दफ्तर में और समय दें और वहाँ की व्यवस्था को ठीक करें। जैसे यहाँ घर पर निर्देश दे रही हो। उसने १५ दिन के लिये ईशान को दूसरे तहसील में भेज दिया है। ईशान बता रहे थे कि न तो वहाँ रहने की कोई व्यवस्था हैं...और न ही खाने पीने की। बहुत मुश्किल से समय निकाल रहे हैं। ईशान तो कहने लगे पता नहीं मैडम को क्या हो गया......एकदम से इतनी रुड कैसे हो गयीं...पहले तो ऐसी नहीं थी? अब मैं उसे क्या जबाब देती?

मुझे भी इस संकट का कोई हल सूझ नहीं रहा था। मैंने भी जल्दी में उससे कह दिया कि तुम ईशान से बोलो अपना तबादला करवा लेi सभी झंझटों से मुक्ति मिल जाएगी। अवनी  तुनकते हुए बोली, क्या तबादला इतना आसान है? इस साल तो होने से रहा ......

 

 मैंने अवनि से कहा... क्या मि. सूद से बात की जाये? नहीं ..नहीं... बिलकुल नहीं ...बच्चों जैसा काम नहीं करेंगे। एक वरिष्ट आईएएस ऑफिसर से ये कहने जाएँ कि अपनी पत्नी से बोलो कि वो अवनी को माफ़ कर दें नहीं ये बिलकुल ठीक नहीं रहेगा। मैंने भी हार मान ली और कहा फिर तुम्ही बताओ कि क्या करना चाहिए। अवनी ने एक गहरी सांस ली और कहा चलो सुरुचि से माफ़ी मांग लेते हैं। क्या तुम चलोगी मेरे साथ, सुरुचि के ऑफिस? मैंने अवनी को समझाते हुए बोला देखो ये तुम्हारे और सुरुचि के बीच का मामला हैi अकेले में जाकर उससे मिलो और सॉरी बोल दो। मेरे साथ में होने पर शायद उसका अहं और जाग जाये और मामला सुलझने की वजाय और उलझ जाये? अवनी मेरी बात से सहमत हो गयी। उसने कहा मैं कल ही सुरुचि के पास जाउंगी....मैं और ज्यादा ईशान को परेशानी में नहीं देख सकती मैंने देखा अवनी मन ही मन बुदबुदा रही थी ....मैं अपने किये का खामियाज़ा ईशान को नहीं भुगतने दे सकती....मैं जाउंगी जरुर जाउंगी ....चाहे मुझे जितनी जिल्लत सहन करनी पड़े।


दूसरे दिन मैं घर में रुकी रही और अवनी को बहुत सारी हिदायतों के साथ सुरुचि से मिलने भेजा। सुरुचि अंदर से घबरा भी रही थी...पता नहीं सोमी.. वो मुझसे कैसे बात करेगी?....बात करेगी भी या नहीं?.....अगर उसने मुझसे मिलने से मना कर दिया तो?अगर ईशान को पता चल गया तो? ना जाने कितने उहम पोह के बीच अवनि सुरुचि से मिलने निकल पड़ी। घबरा तो मै भी रही थी कि पता नहीं सुरुचि अवनि से किस तरह पेश आये?

लगभग दो घंटे बाद अवनी की गाडी कैंपस में दाखिल हुईi मैंने खिड़की से झाँक कर देखा तो अवनी ही थी....लेकिन उसका चेहरा एकदम मुरझाया हुआ था। उसे देखकर मेरी चिंता और बढ़ गयीi मैं जब तक उस तक पहुँच पाती अवनी अंदर आ चुकी थी और बिलकुल हताश अवस्था में आकर सोफे पर बैठ गयी। मैं अवनि से कुछ पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। पानी का ग्लास हाथ में थामे मैं उसके पास जाकर बैठी और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा ...क्यों?...क्या हुआ, सुरुचि तुमसे मिली नहीं? क्या हुआ कुछ बताएगी....मैं अवनी से पूछ रही थी और वो थी कि छत को टक टकी लगाये घूरे जा रही थी...अब मेरे भी सब्र का बाँध टूट रहा था...मैंने अवनी को झिन्झोरते हुए पूछा... मैं तुमसे कुछ पूछ रही हूँ और तुम हो की छत को घूरे जा रही हो। तभी दरवाजा खुला और जोर से खिलखिलाने की आवाज आई। देखा तो सुरुचि हाथ में गुलदस्ता और कुछ पैकेट्स लिये दरवाजे पर खड़ी थी। मैं उसे देख कर अवाक् रह गयी .... सुरुचि...तुम...? हाँ भई ..मैं !...क्या पहचान नहीं रही हो मिस प्रोफेस्सर सोमी महापातरा? मैं कभी अवनी को देखती , कभी सुरुचि को,..समझ नहीं आ रहा था कि माजरा क्या हैं? सुरुचि धीमे से मेरे पास आई, सामान को टेबल पर रखा, और मेरे गले से लग गयी। और धीरे से मेरे कानों में फुसफुसाई....यकीं नहीं आ रहा हैं ना मिस सोमी....ये देख... अच्छे से देख ले.. मैं वही सुरुचि हूँ जिसे तुम लोग आज से १५ साल पहले जीरा पुर के उस स्कूल में छोड़ आये थे।


मैंने उसे सोफे पर बिठाते हुए पूछा...तो क्या तुमने अवनी को माफ़ कर दिया? सुरुचि खिलखिलाते हुए बोली अरे धत तेरे कि ...माफ़ कर दिया? लेकिन उसने किया ही क्या था? वो सारी कडवाहट तो मैं कब का भूल चुकी हूँ।


उस दिन मैं अवनी से इतने रूखे स्वर में इसलिए बात कर रही थी क्योंकि मैं जानती थी अवनी को अपने किये का पछतावा जरुर होगा। मुझे देखते ही वो एकदम घबरा गयी थी इसलिए मैंने भी सोचा कि चलो अवनी को थोड़ी देर परेशान किया जाये। अगर अवनी आज नहीं आती तो सन्डे मैं इसके पास खुद आने वाली थी।

लेकिन ईशान…. उसको तुमने ...इतनी दूर क्यों भेजा? अरे! अगर उसे नहीं भेजती तो आज जो हम लोग भूली बिसरी यादें ताज़ा कर रहे हैं...वो कैसे कर पाते? वो तो कबाब में हड्डी बना रहता। उसका इतना कहना था कि अवनी जोर से ठहाके मार कर हँस पड़ी। मुझे लगा जैसे मेरे मन से मनों बोझ उतर गया हो...और हमलोग जीवन के एक ऐसे मुकाम पर हैं, जहाँ खुशियाँ ही खुशियाँ हैं।


उस रात सुरुचि बहुत देर तक तक हमलोगों के साथ रही। खाने की मेज पर चर्चा करते हुए उसने बताया कि बीती हुई घटनाओं को पीछे छोड़ आगे बढ़ने का नाम ही जिंदगी है। जीवन में बहुत सारी घटनाएँ ऐसी होती है जो हमारे मनोनुकूल नहीं होती इसका मतलब ये तो नहीं कि हम जीना छोड़ दें। मैं अच्छा सोचूं... किसी के साथ अच्छा व्यव्हार करूँ तो परिस्थितियां अपने आप बदल जाती हैं। मुझे अपने आप पर, अपनी बातों पर और अपने व्यवहार पर नियंत्रण होना चाहिए ना कि दूसरों के आचरण और व्यव्हार पर। दूसरों का आचरण उनके संस्कार उनकी परवरिश पर निर्भर करती हैं, तो दूसरों के आचरण से मैं अपने मन को दुखी क्यों करूँ। बचपन से मुझे एक ही बात ज्यादा समझ में आई कि कभी भी किसी की भावनाओं को आहत मत करो....चाहे मानसिक रूप से चाहे शारीरिक रूप से। इस सृष्टी के रंगमंच पर हम सभी पपेट्स हैं....एक जैसे ...और  अपने अपने रोल के अनुसार यहाँ अपना पार्ट अदा कर रहें हैं।


Writer:- Ragini Singh

From:- Bhopal, M.P. (India)

40 comments:

  1. Beautiful story and very well phrased!

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  2. The story is the sweetest and most healing.The plot is fantastic.Ma'm Loved your incredibly heartwarming story.

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  3. splendid and beautifully conveyed story

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  4. Great.. really motivational story

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  5. Spectacularly conveyed story.. highly motivational 😊😊✨

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  6. अत्यंत सुंदर कहानी ।

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  7. बेहतरीन प्रस्तुति एवम उम्दा लेखनी. आपसे अनुरोध है कि समय समय पे हमे ऐसि प्रेरणादायक कहानियों से रूबरू होने का अवसर देती रहें. धन्यवाद् 🙏

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  8. Really very inspiring and motivational

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  9. It was Presented very beautifully. While reading This It seemed as I am a part of this story. Oveall It was Amazing.

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  12. Very nice mam 👌😊 highly motivational✨✨

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  13. Tnqq mam for motivate us
    Nd it's amazing
    😊😊😊

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  14. This story is too nice. Thanks mam for share this story with us

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  15. रुचिकर एवं प्रेरणादायक रचना। अति उत्तम मैडम।👌💐

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  16. Wow ragini ma'am. Superb concept. A very different yet very related. Keep writing

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