कहाँ मानती है माँ - by Prem Kumar Tripathi 'Prem'


कहाँ मानती है माँ

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हाँ ठीक हूँ, इतने से कहाँ मानती है माँ।

कलेजे के टुकड़े का रग-रग पहचानती है माँ।।

फोन उठता है देर से तो व्याकुल हो जाती है माँ

पूरी घण्टी बजने पर भी जब नहीं उठता फोन

हो जाता है गर्म बाजार कयासों का

माँ पर बीतती क्या है उस वक्त

इसे खुद माँ ही समझ सकती है

मगर माँ मानने वाली नहीं हार

अन्य तरीकों से सम्पर्क करना जानती है माँ।

हाँ ठीक हूँ, इतने से कहाँ मानती है माँ।

यदि फोन उठ भी गया तो

 पहली आवाज में ही जान लेती है

 कुशल-अकुशल, भूख-प्यास की सारी बातें

मानो उसने किया हो शोध हृदय विज्ञान में

ज्योतिष शास्त्र और खगोल विज्ञान में

ईश्वर के जैसे जानकारी रखती है माँ

बहानेबाजी पर तुरन्त लताड़ती है माँ।

हाँ ठीक हूँ, इतने से कहाँ मानती है माँ।


- प्रेम कुमार त्रिपाठी 'प्रेम'

प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश

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