चलो चलें गाँव की ओर - by Sunita Keshri


चलो चलें गाँव की ओर

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चलो चलें गाँव की ओर!
जहाँ मिलती है शीतल हवा,
कल-कल करती बहती है नदियाँ।
हरी-भरी वादियाँ देख,
मन खिल जाते हैं।
जहाँ अपने पराए का भेद नहीं,
सब अपने बन जाते हैं।
जहाँ संस्कार की खुशबू,
जीवन सुंदर बन जाते हैं।
भारतीय संस्कृति मिलती यहाँ,
छोटे-बड़े का सम्मान करें सब।
मिलती यहाँ रीति-रिवाज पुरानी,
पर लगती बड़ी प्यारी।
आई अगर मुसीबत तो,
मिल-जुल कर सब निपटाते हैं।
अपने हाथों से खेतों को,
हरा-भरा कर जाते हैं।
जहाँ महिलाएँ घुंघट में,
सुंदरता को सजोए रखती है।
अपने हाथों से पकवान बनाकर,
सबको स्वस्थ रखती है।
माँ के आंचल में,
सुकून मिलता है।
अपनों के साथ रहकर यहाँ,
 जीवन खुशियों से कट जाते।
चलो चलें हम गांव की ओर!

- सुनीता केशरी 
 पिपरिया कवर्धा, छत्तीसगढ़

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