तू उद्धरण बन - by Saket Ranjan Bharti


तू उद्धरण बन

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है आहत तू तो क्या हुआ,

चल फिर से पंख तो फड़फड़ा।

हौंसले की उड़ान सब देती है,

जरा सपनों से तू आँख तो लड़ा।।


भले तू भीतर से टूटा बहुत है,

देख अभी भी भीतर इक आस है।

हार न मान तू अभी हारा नहीं है,

तेरी हिम्मत तेरी जीत की प्यास है।।


चल चल कर आकाश को नाप,

नहीं छू सकता इक प्रयास तो कर।

भले लड़खड़ा रहे हैं अभी कदम तेरे,

पर अपनी कोशिश पर विश्वास तो कर।।


तेरे कदमों की आहट नई इबारत लिखेगी,

फिर आसमान से आगे भी सफर तय होगा।

देख ठहरना रुकना तेरे भाग की नियती नही,

तेरा हर कदम मंजिल मिलन सुरमय होगा।।


दूर क्षितिज पे मंजिल इंतजार में खड़ी है,

मत भूल तुझ में अभी भी साँसों का संचार है।

तूफान देख छोड़ खिड़कियाँ बन्द करनी अपनी,

दो घड़ी गुजरने पे सब ओर बहार ही बहार है।।


उठ पहचान स्वयं को तू कौन है,

अपने हौंसलों को इक नया रंग दे।

नहीं पसरना है आहत हो कर तुझे,

बन कर उद्धरण जीत का नया ढंग दे।।


- साकेत रंजन भारती

बेगूसराय, बिहार

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