तुम सपनों में आई - by Acharya Raghuvendra Arya
तुम सपनों में आई
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इस प्रेम को आखिर में क्या समझूँ
शक्ति है या उलझन है?
या फूटी फिर अन्तर्मन से
मधुर मदिर एक ज्वाला है।
अहंकार था जिस सुन्दरता पर
अब शायद वह नष्ट हुआ।
मुक्त हुई तुम अपने तम से
जंजीरों सब बन्धन से।
जब-जब तुम स्वप्नों में आए
मन को मथित किया तुमनें।
फिर क्यों तुम स्वप्नों में आते
मन-मानिक सब भर जाते।
निर्झरिनी की गोद में बैठा
सुनता हूँ मैं तेरे स्वर को।
कल-कल,छल-छल मधुर धुनें वो
मन को वस में कर जाती।
उस धुन में तन्हा जब-जब मैं
सौन्दर्य रश्मि संग तुम आई
झट से फिर बदरी सम छाकर
हृदय - कँवल तुम मुस्काई।
कल कि बात कहूँ मैं तुमसे
मम सपनों में तुम आई।
ब्रह्म मूहुर्त-सी पावन बेला
घड़ी मधुर थी मुस्काई।
समय, गया तुम चली छोड़ प्रिय
विरह व्यथा का क्षण लाए।
आवाज तुम्हें जब भी देता
प्रति उत्तर क्यों न फिर आए?
हृदय-राग शृंगार नव सब
हो निरंग मन व्याकुल करता।
खुली आँख तब मन व्याकुल था
चित्कार किया स्वर रूठा।
ढूंढ रहे थे नयन मेरे प्रिय
नयन कँवल के तारों में।
मिली नही तुम ढूंढ तुमको
मन:लोक के कोने में।
मन-मयूर मायूस हुआ तब
दिखी नहीं छवि मुझको तव।
अब इस प्रेम को नाम क्या दूँ प्रिय
प्रीति, समर्पण, आलिंगन को?
क्या प्रेम जीवन में तेरे प्रिय
जुगनू सम नित जलता-बुझता।
या स्वरूप कुछ और है प्रिय
जिस निरंग को मैं जान न पाया...!
- आचार्य रघुवेन्द्र आर्य
पौड़ी गढ़वाल,उत्तराखण्ड
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