ऐ दोस्त - by Md. Javed Saudagar

ऐ दोस्त

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इलज़ाम लाज़िम है,

तुम पे भी ऐ दोस्त,

ग़र ग़ुनाहग़ार मैं हूँ तो,

शरीफ़ तुम भी कहाँ हो।


ख़ूब लूटी है दौलत-ए-मोहब्बत,

मिल के ज़माने से,

हमने सर-ए-बाज़ार,

ग़र रईस मैं हूँ तो,

ग़रीब तुम भी कहाँ हो।


बहुत बद अख़लाकियाँ भी की हैं हमने,

ख़ुद को बेहतर दिख़ाने में,

ग़र बेवकूफ़ मैं हूँ तो,

दानिशमंद तुम भी कहाँ हो।


किस उरूज़ पे पहुणच गए हैं हम,

इस मुकाबले के दौर में,

ग़र फ़लक़ पे में हूँ तो,

ज़मीन पे तुम भी कहाँ हो।


नफ़रतों की लौ से जला रख़ा है,

दिलों के चराग़ों को,

ग़र राख़ में हूँ तो,

बचे तुम भी कहाँ हो।


चलो मोहब्बतों की ख़ेती करें,

दिलों की ज़मीनों पे,

ग़र ज़मींदार मैं हूँ तो,

बे-ज़मीन तुम भी कहाँ हो।


बड़े नसीबों और दुवाओं से मिले हैं,

हम तुम्हें और तुम हमको,

ग़र ज़हे-नसीब मैं हूँ तो,

बदनसीब तुम भी कहाँ हो।


इल्ज़ाम लाज़िम है,

तुम पे भी ऐ दोस्त,

ग़र ग़ुनाहग़ार मैं हूँ तो,

शरीफ़ तुम भी कहाँ हो...!!


- मो० जावेद सौदागर

रीवा, मध्य प्रदेश

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