रोटियाँ - Suresh Kumar 'Raja'


रोटियाँ

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ईंटों के चट्टे हैं सर पर

हाँथ धधकती भट्ठियाँ।

पेट की अग्नि ठंडी करती

गर्म तवे की रोटियाँ।


कोयले की खानों में तपती

पत्थर तोड़ें हीरा गढतीं

मीलों तक पैदल चलती है

सर पर रखकर बोरियाँ।


अपनो को कोई छोड़कर जाए

दूर-दूर तक ठोकर खाए।

जी तोड़ मेहनत करने में

लगा दे एड़ी चोटियाँ।


कहीं भूख से बच्चा रोता

भरपेट खाकर कोई सोता।

मक्खन लगाकर कोई खाता

कोई देखे सूखी रोटियाँ।


महामारी के दंश के भय को

याद करेंगी पीढियाँ।

जीव जन्तु सब सोंच में डूबे

मिलेंगी कैसे रोटियाँ।


- सुरेश कुमार 'राजा'

बाँदा, उत्तर प्रदेश

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