बेटी हूँ मैं - by Ruhi Singh


बेटी हूँ मैं


समाज के झूठी रिवाजों में बंधी, 
ख़ुशियों को दोगुणी करने वाली ज्योति हूँ मैं !
बेटा नहीं, अपने पिता की बेटी हूँ मैं !!

अधिकार मिला नहीं मुझे अग्निदान का,
परिवार की हर अग्निपरीक्षा की साक्षी हूँ मैं !
बेटा नहीं, अपने पिता की बेटी हूँ मैं !

भले ही मातम मनाया हो जग ने जन्म पर मेरे,
पर अपने पिता की पूरे जीवन की पूँजी हूँ मैं !
बेटा नहीं, अपने पिता की बेटी हूँ मैं !!

रिवाजों की कई चादर में समेटे खुद को
एक पिता की, आशाओं की उच्चतम चोटी हूँ मैं !
बेटा नहीं अपने पिता की बेटी हूँ मैं !!

क्यूँ फटकार दी जाती है एक बेटी को हमेशा 
इस समाज में अपना भी एक वजूद, ढूँढती हूँ मैं !
बेटा नहीं, अपने पिता की बेटी हूँ मैं !!

'कुल' की लाज कहलाने  वाली,
आज अपनों के प्रेम की, भूखी हूँ मैं !
बेटा नहीं, अपने पिता की बेटी हूँ मैं !!

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