भेद-भाव का दंश - by Pooja Sharma


भेद-भाव का दंश


एक दिन अक्षर `अ` बोला कि, मुझे स्वयं पर है अभिमान,

मैं ही सबसे प्रमुख हूँ अक्षर, मेरा सर्वाधिक सम्मान,

मन में शंका तनिक हो जिसके, देता हूँ मैं ठोस प्रमाण,

साथ मेरा जो शब्द पा जाए, बढ़ जाए उसका भी मान।

जैसे `अ` से अचल, अभेद जैसे `अ` से है अविराम,

जैसे अनंत, अडिग, अनुपम है जैसे `अ` से है अभिराम,

उद्घोष हुआ हर ओर से तब यह, `अ` अक्षर है अभिनंदन,

पक्ष में `अ` के सभी खड़े थे, चाहे स्वर हो चाहे व्यंजन।

तब `ई` ने एक आवाज़ उठाई बोली यह स्वीकार नहीं है,

औरों को कम कर के आँको तुमको यह अधिकार नहीं है,

हो हर अक्षर का मोल बराबर, तब बनती है अक्षरमाला,

भेद-भाव के दृष्टिकोण ने, `अ` और `ई` में अंतर डाला।

सोचो जो अक्षरमाला से `ई` अक्षर गायब हो जाए,

इसके बिना धरा ना धरती, ना माता जननी कहलाए,

ना जल को हम कहते पानी, ना जंतु कहलाते प्राणी,

भेद- भाव के दंश ने देखो, `ई` की शक्ति ना पहचानी।

इस समाज में झाँक के देखो, `अ` है नर और `ई` है नारी,

नर को हर सम्मान यहाँ पर, नारी का संघर्ष है जारी,

माँग समय की अब पहचानों, ना नारी अबला बेचारी,

सुदृढ़ समाज की नींव पड़े, जब मिलकर साथ चलें नर नारी।

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