वसुधा का विश्राम - by Sudha Kumari
वसुधा का विश्राम
पूछा मैंने पृथ्वी से-
" विश्राम करोगी ?
सदियों से चलते पग,
तनिक विराम न दोगी ?
तुच्छ जीव श्रम- स्वेद बहा
नित दिन थक जाते
सप्ताहांत अवकाश मिले
इतवार मनाते। "
चंदन, पुष्प- सुगंध भरा
एक झोंका आया
अंबर से संदेश अवनि
का जैसे लाया-
"सूर्य- चंद्र और कालचक्र
विश्राम न लेंगे,
जिस पल ये रुक जायँ
सृष्टि के गीत थमेंगे।
शिशु विश्राम लीन हो
फिर भी माँ है जगती
निद्रालीन अलस शिशु का
मुखचंद्र निरखती।
मानव-शिशु जीवन- यात्रा
संपूर्ण करूँगी
तभी रुकेगा समय और
मैं तभी रुकूँगी। "
-- सुधा कुमारी

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