गंगा की पीड़ा - by Anuradha Yadav
गंगा की पीड़ा
यातनाएँ कब तलक चलती रहेंगी संग हमारे।
चल कर नही पहुँचे ,लाए गए हैं गंगा किनारे।
जीवन भर का सुख दुख
मौत झाँक रही थी आँखों में
सांसों की बंधन टूट गए
सारे अनुबंधन छूट गए
गंगा कितना तर्पण करती
मनु का कितना दुख हरती
वो भी क्या मानव संग मरती
सहज सरल गहरी धारा ने
लगा दिए सब पाप किनारे
क्षीण हो रहा सांसों का बंधन
पाप पुण्य का ऐसा क्रंदन
संस्कारों की धरती के माथे
थोप दिया कलंकित चंदन।
रूदन धारा भी करती है
मानवता क्या यूँ मरती है
क्या जीवन उस पर कहीं है
पुनर्जन्म की आस वहीं है
अर्पण तर्पण और समर्पण
अंतिम चाह यही थी बाकी
अपने पास रहें अपने
ना बोझिल हो जीवन के सपने
संघर्ष भरे इस काल में
दुर्दिन की ऐसी बेला है
हर साथी आज अकेला है
ये दुनियाँ लाशों का मेला है
जीवन मरण है एक समान
सबके टूट रहे है अरमान
बाँध के बैठे सब सामान
किसी को नहीं कोई अनुमान
कब तक सांसों का उन्मान
आओ बैठो साथ हमारे
कब जाने ये गंगा तारे
सब लग जाएँ एक किनारे
ना कोई अपना हमें पुकारे
कोई रीत नहीं दुनिया की
एक दूजे के सब बने सहारे
हाथ पकड़ जो साथ निभाएँ
तर जाए सारे के सारे।


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