वसन्त - by Amit Tiwari


वसन्त


पानी की बूँद गिरी नभ से 

मन्द-मन्द शीतल-शीतल,

इन्द्रधनुष छा गया गगन पे 

बूँद टपक गई धरती पर। 


बूँद देखकर धरा भी मचली 

पीकर उसको हो गई तृप्त,

पेड़ों ने भी पत्ते बदले 

पवन बहे फिर मधुर-मधुर। 


पंछी गायें गीत सुहानें 

जीव-जन्तु हो गए प्रसन्न,

चहुँ ओर छाई हरियाली 

लगता है आ गया वसन्त।।

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