वसन्तपानी की बूँद गिरी नभ से मन्द-मन्द शीतल-शीतल,इन्द्रधनुष छा गया गगन पे बूँद टपक गई धरती पर। बूँद देखकर धरा भी मचली पीकर उसको हो गई तृप्त,पेड़ों ने भी पत्ते बदले पवन बहे फिर मधुर-मधुर। पंछी गायें गीत सुहानें जीव-जन्तु हो गए प्रसन्न,चहुँ ओर छाई हरियाली लगता है आ गया वसन्त।।
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