सुषमा बिखेरती - by Priyanka Pandey Tripathi
सुषमा बिखेरती
शरद ऋतु की अतुलित आभा,
बिखेरती प्राकृतिक सुषमा।
स्फटिक-आकाश तैरते हुए,
उभरे बादल कपासनुमा।।
बूंद - बूंद बरसता,
अचला की प्यास बुझाता।
सोंधी - सोंधी खुशबू से,
मही का आंगन महकाता।।
नभ से गिरती ओस की बूंद,
पल्लव- पल्लव पर दमकती।
जैसे तरू ने बिखराए हो,
पात पर शबनम के मोती।।
मंद-मंद चलती मधुर हवा,
पत्र पर करती हलचल।
तरू नीड़ में सोते परिंदे,
नेत्र खोल करते कलरव।।
झर - झर झरता झरना,
कल - कल बहती आपगा।
जल-क्रीड़ा करते हंस,
सुशोभित होता कंज।।
कोयल कूकती शाख पर,
तितलियां चूमती सुमन,
डाली-डाली डोले भंवरा,
चहुंओर करें गुंजन।।
रंग-बिरंगे सारंग,
शोभा बढ़ाते उपवन।
पंकज खोलता पंखुड़ी,
प्रदीप्त होता सरोवर।।
खग उड़ते उन्मुक्त गगन,
लेकर नव उमंग।
मालती लिपटी तरूवर,
नव कोंपलों संग।।
कानन-कानन महकता,
सौरभ फैलाता पुष्प।
देख प्रकृति की अनुपम छटा,
अतुलित मन होता खुश।।


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