मानव : एक मुसाफ़िर - by Suresh Lal Srivastava


मानव : एक मुसाफ़िर


यह दुनिया मानव प्राणी का,

बस एक मुसाफ़िर खाना है।

निश्चित कर्मों को निपटाकर,

सबको  इक  दिन  जाना है।।


जो भी मुसाफ़िर आते यहाँ,

सब भ्रमणशील ही रहते हैं।

जीवन  की  आपा-धापी में,

हर  समय  दौड़ते  रहते हैं।।


आने पर  बधाई  मिलती है,

जाने पर लोग विलखते  हैं।

मेला  है  दुनिया जीवन का,

यह सच्चाई सभी जानते हैं।।


इस विश्व मुसाफ़िर खाने में,

जब  तक जो भी रुकता है।

निज कर्मों की सेवा से वह,

अपनी पहचान  बनाता  है।।


कोई रोता है कोई हँसता है,

औरों  को  कोई सताता है।

कोई गर्व करे स्व जीवन पर,

परहित में रत कोई रहता है।।


रिश्तों-नातों  का सब बंधन,

यहाँ रहते ही  सब रहता है।

जाने  की    बारी  आने  पर,

सारा  बंधन   छुट  जाता है।।


कब कितने दिन कोई रहे यहाँ,

कुछ कहा  नहीं  जा सकता है।

जाने  के  बहाने  बहुत  ही  हैं,

आने   को   जाना  पड़ता  है।।

No comments

Powered by Blogger.