रोटी - by Krishna Kant Badoni


रोटी


यह अभावों की वह बस्ती है
यहाँ जान की कीमत सस्ती है
जहाँ कभी न सुबह होती है
तरसती निगाहों में रोटी है

भूख से व्याकुल बच्चों का रोना
खाली पेट सड़क पर सोना
कैसे कटेंगे दिन ये चार
जिन पर पड़े नियति की मार

कभी जलता चूल्हा यूँ ही बेकार
जब मिलता नहीं अन्न उधार
रोजगार का नहीं ठिकाना
दर-दर पड़े ठोकर खाना


करते दिन भर मजदूरी
हुई न जरूरत फिर भी पूरी
हर काम कराती ये रोटी
उम्र लाचार बनाती रोटी

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