अपनी धुन - by Prem Kumar Tripathi 'Prem'


अपनी धुन


तेरी त्याग- तपस्या से हम,

पुष्प सरीखे खिलते रहते।


दिल गर माना फट भी जाये, 

प्रेम  ताग  से सिलते  रहते।


परवाह नहीं क्या कहे ज़माना, 

अपनी  धुन  में  चलते  रहते।


बाग-बाग दिल होता रहता, 

डूब  प्रेम  में  गलते  रहते।


हर मौसम में फागुन जैसे, 

बन रंगीन  मचलते रहते।


मधुर देख मुस्कान तुम्हारी, 

जैसे मोम  पिघलते  रहते।


गिरने की जब नौबत आती, 

तुझको देख सँभलते रहते।


आँखों से ओझल  होते ही, 

पागल  बने  टहलते  रहते।

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