मजदूर - by Vrindavan Patel
मजदूर
मैं मजदूर हूँ मैं मजदूर,
अपने पेट पालने को हूँ मैं मजबूर।
शिला तोड़ता, बंजर खोदता,
राह बनाने में हूँ मैं मशगूल,
मैं मजदूर हूँ मैं मजदूर।
दो जून रोटी की खातिर,
निकल पड़ा हूँ घर से।
पकड़ तगाड़ी, फावड़ा, कुदाली,
रोटी की डिब्बा धर के।
मिल जाये मुझको रसगुल,
मैं मजदूर हूँ...............।
पेट पालने को.............।
भोर से चला हूँ।
तपती धूप से रगड़ा हूँ।
मेहनत मजूरी करने को
घर बार से निकला हूँ।
सायं को घर आने को हूँ मैं मजबूर
मैं मजदूर हूँ...........।
अपनी पेट पालने..........।
मुनिया की मां की रसोई संजोने।
मुनिया के गुड्डा गुड्डी के खिलौने।
बूढ़ी मां के दवा औषध को लाने।
बापू के तम्बाखू, बीड़ी के बहाने।
चल पड़ा हूँ मैं दूर-दूर,
मैं मजदूर हूँ.............।
अपने पेट पालने.........।
मैं नदी की धार बदलता।
मैं पत्थरों को आकार देता।
झोपड़ी को महल बनाता।
पर मेरी सुध कोई न लेता।
ये सोचकर मैं होता हूँ व्याकुल,
मैं मजदूर हूँ ............।
पेट पालने को............।
है सत्ता के वीर सुनो!
कोई तो मेरी कराह सुनो।
मैं भी जीना चाहता हूँ।
मेरे लिये कोई राह बूनो
देख देख कर हो गया हूँ निष्ठुर,
मैं मजदूर हूँ..........।
पेट पालने को........।
पर्वत की सीना तोड़ता हूँ।
धरती की छाती चिरता हूँ।
मुझमें है सामर्थ इतना,
सत्ता परिवर्तन कर सकता हूँ।
उखाड़ फेंकू मैं सत्ता को वो दिन नही है दूर,
मैं मजदूर हूँ............।
पेट पालने को..........।



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