हम जागेंगे - by Sandeep Katariya


हम जागेंगे


हम जागेंगे तभी जागेगा यह प्यारा देश हमारा,

हम मिलकर चलेंगे तभी बढ़ेगा यह संसार सारा,

श्रम-साध्य व्यक्ति बोएँगे प्रेम-बंधुत्तव की खेती,

सुख की फ़सल काटकर खाएगा ये जग सारा ।


प्रतिदिन आती रहती विपत्तियाँ इस जीवन में,

अक्सर छा जाता गहन अंधकार मानव मन में,

जब धैर्यपूर्वक परिस्थितियों से लड़ेगा प्राणी,

तभी मिटेगा भीतर से अज्ञानता का अंधियारा।



सत्य-अहिंसा, प्रेम-त्याग ही रहा अपना आधार,

जिसके आकर्षण से खींचा चला आया संसार,

यहाँ के लोगों ने प्रेम-हर्ष से सबको स्वीकारा,

वसुधैव-कुटुंबकम ही रहा अंतिम ध्येय हमारा।


जब शिक्षा-संस्कारों को व्यक्ति आत्मसात करेगा,

कोई अन्याय-अज्ञानता का कदापि साथ न देगा,

तभी भटकते राष्ट्र को मिलेगा एक किनारा,

और अविरल बहती रहगी ये उन्नति की धारा।

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