स्वच्छ रहे परिवेश - by Bhashkar Budakoti "Nirjhar"
स्वच्छ रहे परिवेश
होती दूषित अब धरा, दूषित होते देश ।
अगर लगाएँ वृक्ष हम, स्वच्छ रहे परिवेश ।।
उद्योगों के धूम्र से, होती दूषित वायु ।
घुले सांस में विष सदा, करे क्षीण वह आयु ।।
अविरल बहती गंदगी, करे वारि विषयुक्त ।
निज कर्मों को ही सदा, मनुज रहा है भुक्त ।।
वृक्ष लगाएँ हम सदा, करें हरा हर देश ।
अगर लगाएँ वृक्ष हम, स्वच्छ रहे परिवेश ।।
नित्य परीक्षण स्वार्थवश, करे धरा विस्फोट ।
निज के आविष्कार का, कभी न देखे खोट ।।
बढ़ा प्रदूषण देश में, नहीं नियोजित कार्य ।
उड़े धुआँ उद्योग का, रहे सदा परिहार्य ।।
जीना है तो कार्य कर, बंद करो उपदेश ।
अगर लगाएँ वृक्ष हम, स्वच्छ रहे परिवेश ।।
व्योम परत काली पड़ी, वायु प्रदूषित आज ।
घुले गरल अब साँस में, हुआ पतन आगाज ।।
रहे धरा दूषित अगर, समझो जीवन नाश ।
नहीं स्वच्छ साँसें मिलें, मानव सदा हताश ।।
मानव के करतूत से, हुए श्वेत अब केश ।
अगर लगाएँ वृक्ष हम, स्वच्छ रहे परिवेश ।।
खुद का दुश्मन आदमी, लगे वही अब हेय ।
घुले गरल अब नीर में, नहीं बचा है पेय ।।
करें स्वच्छ पर्यावरण, मिलकर सब समुदाय ।
हरी भरी अब हो धरा, ऐसा करें उपाय ।।
चलो बचाएँ हम धरा, दें सबको सन्देश ।
अगर लगाएँ वृक्ष हम, स्वच्छ रहे परिवेश ।।


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