ठिठुरन - by Madhuri Verma
ठिठुरन
ठिठुरन शब्द मुझे एक साथ कितने अहसास करा रहा है,
दिसंबर का ये ठंड सबके हिस्से में अलग अलग आ रहा है,
एक नव विवाहित जोड़ा कश्मीर घूमने के लिए जा रहा है,
वहाँ की बर्फ़बारी देखने का दोनों को उत्साह हो रहा है ।
इस भीषण ठंड में भी एक सैनिक पति लद्दाख जा रहा है,
पीठ पर बोझ है आँखें नम हैं नवजात शिशु को सहला रहा है,
आँखों से बहता आँसू पत्नी के गालों को कितना भिगो रहा है,
दोनों अनजान हैं मिलना होगा या नहीं भावी दुख सता रहा है ।
उस तरफ़ जलते अलाव को घेरे बैठे लोग ठिठुरन मिटा रहें हैं,
नि:शब्द सड़क की पटरियों पर सोने के लिए चादर बिछा रहें हैं,
रात के सन्नाटे ही साथी हैं उनके जो दिन का श्रम मिटा रहे हैं,
रात कट ही जायेगी बंद पलकों में कल का सपना बसा रहे हैं ।
थका किसान अपनी झोपड़ी के फ़र्श पर पुआल फैला रहा है,
बाहर पत्नी थाली में लिए रोटी तरकारी सबको बुला रही है,
हाड़ कँपातीं ठिठुरन से बचने को बोरसी में आग सुलगा रही है,
पूस और माघ किसी तरह बीते हाथ जोड़ देवता मना रही है ।
मुझे नया कोट चाहिए मेरा छोटा बेटा देर से मचल रहा है,
मुझे भी नया स्वेटर चाहिए बेटी भाई से राग मिला रही है,
बच्चों को मैंने समझाया चलो कुछ नये कम्बल ख़रीदेंगे,
पटरी पर ठिठुरे लोगों को ओढ़ा कर उनकी ठिठुरन मिटायेंगे ।


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