दिवा स्वप्न - by Smriti Thakur


दिवा स्वप्न


ह्रदय तार से झंकृत होकर,

कुछ स्वप्न पनपते देखा है।

निश्छल अश्रुओं की धार में,

वक्त बदलते देखा है।

हों कितनी ही टेढ़ी राहें,

इंसानों को चलते देखा है।

न रह पाते राग-द्वेष,

नफरत का वक्त बदलते देखा है।

उम्मीद बनी रहे इस जीवन की,

इंसानों को रंग बदलते देखा है।

जीवन के कुछ दिवा स्वप्न को,

अक्सर सच होते देखा है।

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