अपनी धरती, अपना देश - by Dr. Ramesh Chand Sharma
अपनी धरती, अपना देश
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अपनी धरती अपना ये देश,
अपना अम्बर अपना परिवेश।
मृगतृष्णा मात्र जाना परदेश,
सुख का आधार अपना देश।।
देश अपना है स्वर्ग सरीखा,
समान इसके कोई न दिखा।
तभी तो पाठ मैंने ये सीखा,
यह देश ज्ञान की दीपशिखा।।
धरती अपनी सब कुछ करती,
सभी की पीड़ा को है ये हरती।
अन्न जल के है भंडार भरती,
संतानों की तरह पालन करती।।
मेरा यह देश, मेरी यह धरती,
कैसे कहूँ कि कुछ नहीं करती।
आओ! लाएँ इस में हरियाली,
बजाएँ इसके लिए, हम ताली।।
आज जरूरी है, सभी का साथ,
लेकर चले हम, हाथों में हाथ।
धरा स्वामिनी व देश है नाथ,
इनके अभाव में है हम अनाथ।।
समझे हम, अपने देश का मूल्य,
स्वीकारें, धरा की संपदा अमूल्य।
नहीं संसार में कोई इसके तुल्य,
महिमा देश व धरती की अतुल्य।।
- डॉ० रमेश चन्द शर्मा
चंडीगढ़, भारत


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