फर्ज पर कुर्बान - by Ashima Varshney


फर्ज पर कुर्बान

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भावनाओं का आवेग

घन सा घुमड़ रहा,

आँसुओं का ज्वार

पलकों में उमड़ रहा।


गर्व से मस्तक उन्नत है

ममता की झोली है रीती,

युद्ध के सौदागर क्या जानें

इक माँ के दिल पर क्या बीती?


फर्ज पर कुर्बान हुआ जो

मेरा अकेला लाल था,

दुश्मन की गोली में हाँ!

सरहद पर बैठा काल था।


भारत माँ की रक्षा खातिर

गंवा दिए थे उसने प्राण,

कलेजे का टुकड़ा था मेरा

हृदय आवेग कैसे हो शांत?


सीने से चिपका कर वर्दी

थककर जब सो जाती हूँ,

स्वप्न में देख सलोना मुखड़ा

चैन तनिक सा पाती हूँ।


- आशिमा वार्ष्णेय 'राज'

बेंगलुरु, कर्नाटक

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