बस इतनी गुजारिश है - by Dr. Ratna Manik
बस इतनी गुजारिश है
बस इतनी गुजारिश है
हो अमन और शांति
यही ख्वाहिश है
यूँ तो सभी हैं
दिलदार जा निशां यहाँ
पर सब के दिलों में
वतन का प्यार कहाँ?
तोहमतें लगाते हैं
हैवानियत की
एक दूसरे पर
बनते हैं रहनुमा, नुमाइंदे
धर्म के ठेकेदार पर!
हर घर में गूंजती हैं
सिसकियां बहनों की
दम तोड़ती हैं
ख्वाहिशें
अपनों की
कहाँ गई
शहीदों की वो शहादतें ?
वो देश पर
मर मिटने की चाहतें
वो कुर्बानियां
जिसमें बही थी
नदियाँ खून की
देश के जान्बाजों ने
हदें पार की थी जुनून की
आजादी का आज
खुला नीलाकाश है मगर
खौफ व वहशीपन का
छाया है ज़हर इस कदर
दम तोड़ती है सच्चाइयाँ
शाम-ओ-सहर
सिहर उठती है रूह
कब क्या हो ? किसे खबर ?
हैं अपने ही सभी फिर यह
नफरत, घृणा का व्यापार क्यों ?
आओ करे संकल्प
और बसाएँ
उम्मीदों का शहर
हो अमन, चैन व इंसानियत
हर डगर-डगर
बस इतनी गुजारिश है!
हो अमन और शांति यही ख्वाहिश है
हो अमन और शांति यही ख्वाहिश है।
- डॉ रत्ना मानिक
टेल्को, झारखंड


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