आज़ादी के क्रान्तिवीर - by Kumar Avishek Anand


आज़ादी के क्रान्तिवीर

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आज़ादी के जंग में, बलिया का वीर जवान उठा।

सन संतावन के विद्रोह में, मंगल पांडे गतिमान उठा।

आज़ादी के सपनों से, घर-घर में ऐसी आग लगी।

वीर सपूतों के बलिदानों से, भारत का सोया भाग्य उठा।

सपने सच हो इस कारण, मैदान में लक्ष्मी आयी।

झांसी के इस रानी ने, अंग्रेजों को धूल चटाई।

रक्त बहा, दे कुर्बानी से, भारत का श्रृंगारित भाल उठा।

फिर अस्सी वर्षों की आयु में, वीर कुंवर एक नाम उठा।

छक्के छुड़ा के अंग्रेजों के, बाहों में गोली खाई।

काट हाथ को अर्पण कर, गंगा में भेंट चढ़ाई।

बूढ़ी हड्डी के इस जौहर से भारत का स्वाभिमान उठा।

वीर सपूत के बलिदानों से, भारत का सोया भाग्य उठा।

पूर्ण स्वराज्य का अलख जगाने, जब लाल,बाल और पाल उठा।

अंग्रेजों को सबक सिखाकर, दुनिया मे भूचाल उठा।

मूछों पर ताव को देकर, वीर भगत, आज़ाद उठा।

पहन बसंती चोला जब, भारत का इंकलाब उठा।

सुखदेव, राजगुरु संग जब भगत को फाँसी हुई।

बलिदानों के पुण्य पर्व से, भारत का हुंकार उठा।

रक्त-कणों से लिखी हुई, जय-हिंद जिसकी निशानी थी।

ऐसे सुभाष के क्रांति से, भारत में गज़ब उबाल उठा।

फिर सत्य-अहिंसा के पथ पर, गांधी ने लाई भीषण आँधी।

नाप कर कोसों भूमि को, कर डाली यात्रा डांडी।

स्वदेशी का झंडा ले, आज़ादी का मशाल उठा।

वीर सपूत के बलिदानों से, भारत का श्रृंगारित भाल उठा।


- कुमार अभिषेक आनंद

साहिबगंज, झारखंड

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