प्राणों से प्यारा भारत - by Shivprakash Awasthi


प्राणों से प्यारा भारत

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भाल हिमालय''सागर''पद तल, 

दिनभर "दिनकर'' तपता है।

मेरा "भारत" है महान,

प्राणों से प्यारा लगता है।


कल-कल करतीं नदियाँ,

इसके झर-झर झरनें झरते।

कोयल, मोर, पपीहा बोले,

अलिगन गुंजन करते।

जीवन धन ये प्राण मेरा,

प्राणों से प्यारा लगता है।।

मेरा 'भारत' है महान..............।।


राग रागिनी बजते हेै,

घुँघरु के स्वर गूँज रहे।

यज्ञ,हवन,जप,तप,व्रत होते,

वेद मंत्र भी गूँज रहे।

'गीता' भी प्यारी हमको,

'कुरान' भी प्यारा लगता है।

मेरा 'भारत' है महान..................।।


प्रतिदिन लगते रहते है,

शहर गाँव मे मेले।

इस मिट्टी मे 'राम' 'कृष्ण' भी,

खेल अनेकों खेले।

नूपुर की ध्वनि से गुंजित,

हर आँगन प्यारा लगता है।

मेरा 'भारत' है महान................।।


गाँवों में फसलें लहराए,

शहरों में कारखाने।

 मेहनत करके श्रमिक,

देश का भरते रहे खजाने।

बदल-बदल मौसम का आना,

कितना प्यारा लगता है।

मेरा 'भारत' है महान..................।।


हर भारत वासी के उर मे,

धधक रहा है शोला।

हर बच्ची बन्दूक की गोली,

बच्चा तोप का गोला।

वीर जवानों का सरहद पर,

पहरा गहरा लगता है।

मेरा 'भारत' है महान.................।।


- शिवप्रकाश अवस्थी

हरदोई, उत्तर प्रदेश

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