राष्ट्र भक्ति - by Dr. Surendra Dutt Semalty


राष्ट्र भक्ति


मातृ भूमि  की  मिट्टी  को ,

सब  जन  समझे   चन्दन ।

इस धरती के रजकण का ,

हम  करें  सदा  ही  वन्दन  ।।


राष्ट्र भक्ति  से  बढ़कर  के ,

कोई   भी  पुण्य  नहीं   है  ।

मर मिटें जो  देश  हित  में  ,

तो  यह   सबसे   सही   है  ।।


भारत के वन-उपवन सब ,

पर्वत  -  सागर  -  नदियाँ  ।

राष्ट्र भक्ति में  रत हर पल ,

बीत   गयी    हैं    सदियाँ   ।।


इतिहास  पलट कर  देखें ,

शुकुन है मिलता  मन को  ।

राष्ट्र भक्ति मे  रहे जो  रत ,

शीश  है  झुकता   उनको  ।।


नदियों  से देश  की  माटी ,

उगल  रही   चाँदी - सोना   ।

हरी -भरी  दिखती   धरती  ,

पूरब-पश्चिम का हर कोना  ।।


मानसून   रोककर   पर्वत  ,

करवाते  धरती   मे   वर्षा ।

इसीलिये भारत भूमि  को ,

हर देश  का  मानव तरसा  !!


सघन वनों ने मातृभूमि का ,

प्रदूषण है  बहुत   मिटाया   ।

सागर की अथाह गहराई ने ,

अपना  वैभव  है   लुटाया  !!


दया धर्म करुणा श्रद्धा का ,

भाव   जगे    रग - रग   मे  ।

हम मानव हैं मानवता  का  ,

सन्देश   फैलायें  जग   में  ।।


जो  मानव  राष्ट्र  भक्ति  में ,

सुख-चैन सब कुछ  खोता   ।

वह  पथ  प्रदर्शक  बनकर   ,

श्रद्धा  का  पात्र  है   होता  ।।


जननी  -  जन्म  भूमि का ,

जो  जन  करते  हैं  वन्दन  ।

उन श्रेष्ठ  जनों  का मानव ,

दिल से करता अभिनन्दन  ।।


- डॉ० सुरेन्द्र दत्त सेमल्टी

टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड

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