श्रमिक नारी - by Hirdesh Verma 'Mahak'
श्रमिक नारी
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मैं श्रमिक नारी हूँ, श्रम की बूँदों से,
जीवन-गाथा लिखती हूँ।
मैं निर्धन उपवन की एक कली,
नित-स्वेद से महका करती हूँ।
मैं निर्झर कमर्ठता का हूँ,
कर्म शक्ति के प्रखर तेज से,
जीवन के खारे विषाद में,
मधु-जल का सिंचन करती हूँ।
धीरज की प्रतिमूर्ति बनकर,
आत्मबल अपना, हाथों में लेकर,
शुष्क धरा के दामन में,
हरे-भरे खुशहाली के रंग भरती हूँ।
जी भर, मैं पत्थर तोडूँ,
इमारतों का आधार गढूँ,
जीविका के संघर्ष में,
ना जाने कितनी आँखों के,
स्वप्न शीशमहल मैं रचती हूँ।
अपने अनंत मानस पटल को,
मैंने गृहस्थी की पैरवी में बाँधा है।
ममता का मैं वृक्ष बनी,
ख़ुद को धैर्य से साधा है।
प्राणों का विनिमय करके,
हँस-हँसकर बोझ उठाती हूँ।
मैं तेज़ सूर्य का,
क्या जानूँ मुखमण्डल की शोभा,
लेकर आबले अपने हाथ-पैरों में,
मैं, रज-कणों का शृंगार करती हूँ।
ना शिकायतों का पानी
मेरी आँखों में,
ना निर्मम तकदीर की व्यथा
मेरी बातों में,
हुई मौन मेरी अभिलाषाएँ,
कर्तव्य पथ पर, मगन होकर
मैं, मस्ती का नृत्य करती हूँ।


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