स्वर्णिम भारत - by Shikha Saxena


स्वर्णिम भारत


सुंदरता अगर देखनी हो, आपने मेरे राष्ट्र की,

आओ तुम्हें दिखाती हूँ, तस्वीर हिन्दुस्तान की।

अविरल नदियाँ बहती हैं, कल-कल की ध्वनि करती हैं,

शिखर हिमालयों को छूते हैं, धड़कन आसमान की हैं।

इतिहास की धरोहर मिलती, वीरगाथाएँ भी कम नहीं,

गौतम बुद्ध की शांत भूमि यह, धरा कुरुक्षेत्र की भी रही।

अतिथि देवो भव की गूंज यहाँ, धरा परंपराओं के आन की,

प्रेम, दया, त्याग का भाव यहाँ, धरा संस्कृतियों के पहचान की।

उपदेश गीता के भी मिलते,सब धर्मों की पहचान भी,

जात-पात का भेद न जाने, होली दीवाली मिल मनाएँ सभी।

ये भारत देश है, सबकी धड़कनों की पहचान रखता है,

कभी खुशियों के तो कभी गम के, बादल बरसाता रहता है।

भावनाओं से परिपूर्ण है, सबके सम्मान की रक्षा करता है,

टेक्नोलॉजी के जमाने में भी, अपनी अलग पहचान रखता है।।


- शिखा सक्सेना

दिल्ली, भारत

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