अब क्यों ऐसा हो गया - by Jabra Ram Kandara


अब क्यों ऐसा हो गया

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मात-पिता की सेवा करते, साथ हमेशा रहते थे।

उनकी आज्ञा को मानते, करते जैसा कहते थे।।

अब वो वाली बात रही नहीं, वो तो वक्त गया।

बात अचंभे की लग रही, अब क्यों ऐसा हो गया।।


कपड़े ओछे हो रहे है, कुछ शर्म घटती जा रही।

छोटे-बड़े बराबर हो रहे, मर्यादा मिटती जा रही।।

परिवार सिमटते जा रहे, घर छोटा-सा हो गया।

बात अचंभे की लग रही, अब क्यों ऐसा हो गया।।


ज्ञान-ध्यान की बात न होती, नयापन अखरता है।

टीवी कंप्यूटर मोबाइल से, ध्यान नहीं भटकता है।।

संस्कार दबी जुबाँ हुई, असर पहले का खो गया।

बात अचंभे की लग रही, अब क्यों ऐसा हो गया।।


ईमानदारी तो हिली मूल से, सच्चाई दुबकी बैठी।

अपनापन ओझल हो रहा, मित्रता में शत्रुता पैठी।।

छल-कपट नामी गायक, स्वार्थ वाह-वाह हो गया।

बात अचंभे की लग रही, अब क्यों ऐसा हो गया।।


गाँव गली के बड़े-बूढों से, दादा मान के डरते थे।

गाँव की बहुएँ लज्जाती थी, वो खेंखारा करते थे।।

कन्याएँ नही बड़बडाती, अब सब गड़बड़ हो गया।

बात अचंभे की लग रही, अब क्यों ऐसा हो गया।।


- डॉ० जबरा राम कंडारा

रानीवाड़ा, राजस्थान

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