नशा या नाश - by Nand Kumar


नशा या नाश

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व्यसनों की आदत मत डालो ,

इनको तन से अपने निकालो ।

भीतर-भीतर यह तन खाते , 

बुद्धि, मान, धन सभी नसाते ।।


घर बाहर कोई कदर न करता , 

एकाकी  हो  विचरण करता ।

परिवारी जन  देख  लजाते ,

कठिनाई में  समय  बिताते ।।


व्यसनी कलह और दुख का ही,

कारण  सबके  है  बन  जाता ।

उसके  कार्य उलहने  सुनकर ,

अपनों का दुख बढता जाता ।।


खेती धन सामान घरों का सब ,

व्यसनी व्यसनों में ही गँवाता ।

लाज, शर्म, मर्याद मिटाकर ,

हर क्षण दुख ही दुख है पाता ।।


तन हो जाता दुर्बल उसका ,

लेते घेर रोग सब आकर ।

पछताता कुछ कर ना पाता ,

जग से जल्दी ही उठ जाता ।।


इसीलिए कहता मानव तुम ,

खुद को दूर व्यसन से करो  ।

नशा कर्म अनुचित सब त्यागो ,

 दे सबको सुख सुखी रहो ।।


- नन्द कुमार

पाली, उत्तर प्रदेश

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