परिंदों की भाषा - by Vishdhar Shankar


परिंदों की भाषा

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परिंदों की भाषा को,

परिन्दे ही समझते हैं।

चाल चल रहे हैं क्या,

हम भी अब समझते हैं।


चेहरे पर कहाँ लिखा,

कौन कैसा इंसान है,

आदमी को क्या कहिए,

पल में रंग बदलते हैं।


मुफलिसी तो हर युग में,

ऐसे ही पनपती है,

कुछ ऐसे भी हैं, आदमी,

गिरते हैं, संभालते हैं।


कहीं सैलाब का तांडव,

कहीं शजर काटे जा रहे,

सिसकती है जिंदगी यहाँ,

हम ही सितम सहते हैं।


अपने वतन में हम ही,

रहते हैं दर-बदर, 

दूध के लिए भी

बच्चे सिसकते हैं।


- विषधर शंकर

गया, बिहार

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