चली समर में राणा सेना - by Bhashkar Budakoti "Nirjhar"


चली समर में राणा सेना

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बीस जून पंद्रह छहतर में, करे मुगल मेवाड़ प्रहार ।

लेकर सेना आए राजा, करने को उस पर अधिकार ।।


वीरों की पावन धरती में, संकट के घन घिरे अपार ।

मातृभूमि पर मरने वाले, वीरों ने फिर भरी हुँकार ।।


लिए ध्वजा हाथों में सबने, खड़े हुए थे सब नर नार ।

करने को बलिदान स्वयं का, बच्चा-बच्चा था तैयार ।


तिलक लगाकर वामा फिर से, करे कंत का रण श्रृंगार ।

बाँधे रक्षासूत्र हाथ में, देती बहना शक्ति अपार ।।


थाल सजाकर आती माएँ, दे हाथों में कुल हथियार ।

मातृभूमि की रक्षा करने, गूँज उठी फिर जय-जयकार ।।


चली समर में राणा सेना, लिए हाथ में नव तलवार ।

घात लगाए दुश्मन बैठे, थे संख्या में कई हजार ।।


बजी समर में जब रणभेरी, हुआ द्वंद निर्णायक यार ।

बाँध कफन माथे पर योद्धा, लगे काल का वे अवतार ।।


टूट पड़े दुश्मन बहुतेरे, कपट भाव से करे प्रहार ।

मान चुनौती फिर मुगलों की, करे वीर उसको स्वीकार ।।


झुका सके राणा को रण में, हुआ नहीं पैदा संसार ।।

लगा तिलक नित उस माटी का, जो वीरों की पालनहार ।।


चमक उठी तलवार समर में, हल्दी घाटी में इस बार ।

नारा हर हर महादेव का, लगा गूँजने फिर संसार ।।


बढ़ते राणा समर क्षेत्र में, मान सिंह का कर प्रतिकार ।

लिया खींच तलवार म्यान से, राणा करते भीषण वार ।।


आगे आगे चलते राणा, पीछे सेना भी तैयार ।

लिए धनुष आकर भीलों ने, दिए खूब मुगलों को मार ।।


हुआ द्वंद भीषण दोनों में, बही लहू की अविरल धार ।

काट-काटकर तब मुगलों को, करते राणा अरि संहार ।।


हुए हताहत समर-क्षेत्र में, करे शत्रु तब चीख-पुकार ।

राणा ने दुश्मन वीरों को, दिए मौत के घाट उतार ।।


नोंच-नोंचकर कव्वे खाते, खींच रहे थे श्वान सियार ।

गिद्धों की मँडराती टोली, लगा शवों का था अंबार ।।


मुगलों ने राणा को घेरा, झाला आए बन दीवार ।

भरा जोश बिखरे सेना में, मचा समर में हाहाकार ।।


जागा फिर से भातृ-प्रेम का, शक्तिसिंह में भाव अपार ।

किया सुरक्षित राणा रण से, था भाई का अविरल प्यार ।।


मान सिंह फिर भागा रण से, था अकबर का पहरेदार ।

दौड़-दौड़कर प्राण बचाए, मिला उसे सबका फटकार ।।


प्राण बचाकर मुगल भागते, करे समर्पण आखिरकार ।

सहमे भारत में राणा ने, भरा जोश जीवन संचार ।।


शत्रु रहित कर हल्दीघाटी, चेतक में फिर हुए सवार ।

चले अकेले लेकर भाला, शत्रु खदेड़ा कोसों पार ।।


मिली हार मुगलों को रण में, था चोटिल दिल्ली दरवार ।

राणा से डर-डरकर सबने, किया समर से फिर इंकार ।।


घायल चेतक तेज हीन हो, गया परम जब स्वर्ग सिधार ।

सिखा गया वह देशभक्ति का, मूल मंत्र जज्बा अधिकार ।।


भारत के वीरों को जिसने, दिया समर में जब ललकार ।

बने काल तब युद्ध भूमि में, हो भारत की जय-जयकार ।।


अगर नहीं है देश-प्रेम का, जज्बा मन में सत्य विचार ।

बोझ धरा पर बनकर फिरते, ऐसे जीवन को धिक्कार ।।


जब-जब करते मातृभूमि में, आकर दुश्मन अत्याचार ।

भारत माँ की रक्षा करने, आते राणा ले अवतार ।।


भाष्कर बुड़ाकोटी "निर्झर"

पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखण्ड)

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