अंतर्नाद - by Manju Bhardwaj


अंतर्नाद

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हे गिरिराज! हे गिरधारी!

ये कैसी विपदा भारी है।

अलख अगोचर ओझल अमित्र ने,

किया प्रलय अति भारी है।


न शस्त्र रचा, न अस्त्र सजा,

बिगुल आक्रमण का बज उठा।

ऐसी आँधी आई जगत में,

कितने अपनों का हाथ छूटा।


तू ही सृष्टि, तू ही विधाता,

जग चरणों में शीश नवाता।

सुन जन-जन का अंतर्नाद,

तू क्यों नहीं दौड़ा आता।


तूने महाभारत के युद्ध में,

था ऐसा इतिहास रचा।

अठारह दिनों के प्रहार से

था न कोई असत्य बचा।


इंद्र ने जब गोकुल में,

भयानक कोहराम मचाया था।

गिरिराज उठा कर तूने,

गोकुल को बचाया था।


आज फिर बिलख रही धरा,

है चारों ओर हाहाकार मचा।

एक बार सुदर्शन चक्र उठा,

इस दानव से जग को बचा।


हे वेंकटेश! हे मधु सूदन!

करूँ अश्रु पुरित श्रद्धा अर्पण।

हे माधव! मोहन! ऋषिकेश!

करूँ चरणों में पूर्ण समर्पण।


- मंजू भारद्वाज

हैदराबाद, आंध्र प्रदेश

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