बचपन - by Acharya Dhananjay Pathak


बचपन

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सुन्दर  प्यारा - न्यारा बचपन,

आखों  का  है  तारा  बचपन।

पढो-लिखो चाहे तुम जितना,

बाजी  हरदम  मारा  बचपन।।


भेद  मिटाकर   खेला  करते;

एक - दूजे  को  मैला  करते;

चिड़ जाते जब बात-बात में,

धूल  परस्पर  झारा  बचपन।।


संग - साथ  में  खाना - पीना;

सोना - जगना  मरना - जीना;

कैसे   बीता   याद   मुझे   है,

मेरा   और   तुम्हारा  बचपन।।


स्नेह  माँगता  पर  को  छूकर;

कभी  डराता  है  हू - हू  कर;

धन - निर्धन से यह अनजाना,

होता    राजदुलारा    बचपन।।


बात - बात  में  जग हरषाई;

नये  खिलौने  मधुर  मिठाई;

बड़े  प्यार से चाँद - सूर्य या

माँगे नभ का  तारा बचपन।।


 - आचार्य धनंजय पाठक

डालटनगंज, झारखण्ड

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