पिता का स्नेह - by Ashish Tripathi "Rudransh"


पिता का स्नेह

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पिता -

मंजिल स्वयं ही पाओगे तुम,

ये बादल भी छट जाएँगे,

इस पल से घबराना ना तुम।

गम्भीरता से लो इस पल को,

कल को पछताओगे ना तुम।


पुत्र -

हूँ मैं भी सफर में पापा,

मिल जाएँगी मंजिल मुझे।

ठान लिया है मैंने भी अब,

कल को पछताएँगे नहीं हम।


मंजिल पाने के वास्ते जी-जान से मेहनत करेंगे,

परिस्थितियाँ कैसी भी हों डटकर सामना करेंगे।

खून-पसीना बहाने पड़े तो भी सफर से ना भटकेंगे,

या नींद छोटी करनी पड़े तो भी ना संकोच करेंगे।


परास्त हुआ कभी मंजिल से मैं,

आपकी बातें जामवंत बन मुझको राह दिखाएँगी।

“का चुप साधि रहा बलवाना” कहकर,

आपके सुत का हौसला बढ़ाएँगी।


पिता-

कर्तव्य मेरा भी है बेटा,

हौसला तुम्हारा बढ़ाना।

अफसर बनो या ना बनो,

इंसान जरूर तुम बन जाना।


पुत्र -

मैं खुद को तपा कर भी पापा,

जीवन स्वर्ण बना लूँगा।

अफसर बनूँ या ना बनूँ,

इंसान जरूर बन जाऊँगा।


- आशीष त्रिपाठी ‛रुद्रांश’

छपरा, बिहार

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