बिंदी का महत्व - by Kushalraj 'Kushal' Indalia


बिंदी का महत्व

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नन्हीं-सी होती हैं बिंदी,

भाषा रखती पीछे हिंदी।


मात हमें जीवन में देती,

नहीं रहती वह स्थिर लेटी।


शब्दों के वह अर्थ बदलती,

कुंती से वह कुती बन जाती।


भाषा में भानु की किरण,

अर्भकों को लगती है हिरण।


नन्हीं-सी होती हैं बिंदी।

भाषा रखती पीछे हिंदी।


बिंदी की महिमा निराली,

भाषा में सूरज की लाली।


शब्दों को रखती हैं अटल,

शब्द बिगड़ जाते हैं जब जाती हैं बिंदी टल।


भाषा में मिल जुल कर रहना,

बिंदी है शब्दों का गहना।


बिंदी तू है अजब निराली,

भाषा में अमय की प्याली।


नन्हीं-सी होती है बिंदी।

भाषा रखती पीछे हिंदी।


बिंदी पीछे जब वह रहती,

शब्दों के वह भाव बदलती।


शब्दों के संग बिंदी रहती,

बिंदी है शब्दों को चहेती।


शब्दों में वह अलख जगाए,

मंद - मंद अमृत पिलाए।


अर्भकों को लगती वह खारी,

असफलता की वह तैयारी।


बिंदी कोलार कनक की किरण,

शब्द बनाती जीर्ण - शीर्ण।


नन्हीं-सी होती है बिंदी,

भाषा रखती पीछे हिंदी।


- कुशलराज "कुशाल" इन्दलिया

बीकानेर, राजस्थान

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