बुद्धम् शरणम् गच्छामी - by Ratna Bapuly
बुद्धम् शरणम् गच्छामी
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त्रेता युग में हुए श्री राम,
द्वापर में हुए प्रभु श्याम
शुद्धोधन सुत बुद्ध बने,
कलियुग के भगवान।
मानव जग मे स्वयं भोगता,
अपने ही कर्मो का भोग,
प्रभु ने भी यही कहा था,
कष्टो का है कर्मो से जोग।
पाप कर्म की गठरी भारी,
मुक्ति नहीं है इससे हमारी,
गर मिलकर हम न कहे ये,
बुद्धम् शरणम् गच्छामी।
घर-घर का है यह रोना,
अपना होता जाए बेगाना,
ईर्ष्या, गर्व व स्वार्थ का धूल,
पैदा करता घृणा का शूल,
दूर न होगी यह परेशानी,
गर न कहे हम सच्चे मन से,
बुद्धम् शरणम् गच्छामी।
जीवन के सान्ध्य बेला को,
और मधुमय बना डाले,
भक्ति भाव ले मन से कहे,
बुद्धम् शरणम् गच्छामी।
- रत्ना बापुली
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
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