पंचतत्व - Shital Shailendra "Devyani"
पंचतत्व
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पंच तत्वों से बना हुआ,
माटी का यह रूप स्वरूप।
एक दिन माटी में ही तो,
मिल जायेगा,
पंचतत्वों से बना शरीर।
कुम्हार प्रभु रचता है,
रख चाक पर गीली मिट्टी।
इंसान देता खुद स्वरूप,
गीली मिट्टी से बनने,
और भट्टी में तपने तक।
कभी सुघड़, कभी सुन्दर रूप,
कभी घमंड़ वश,
होता विकराल-सा रूप,
घिसना पिसना पड़ता है।
तभी गड़ता है कुम्हार मिट्टी में रूप।
कुम्हार रौंद रौंद माटी को,
श्रृंगार करें अदभूत और भरपूर।
प्राण प्रतिष्ठा कर डाले,
बेजान सी मूरत में और मुरत में,
डाले अपने हाथों तत्व सजीव।
प्रकृति प्रदत्त है निर्माण उसका,
माटी जैसी ही निर्मल काया।
तन स्वर्णिम आभूषण सा दमके,
सुसज्जित गुणों की,
वह है निर्मल छाया।
सोच सोच प्रभु भी हैरान हैं।
फिर घमंड़ ईर्ष्या गुणधर्म,
इंसान ने कहां से पाया है।
मैने माटी से इंसान बनाया,
फिर शैतान इसमें कैसे समाया है।।
- शीतल शैलेन्द्र "देवयानी"
इन्दौर, मध्य प्रदेश
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