चक्रव्यूह - by Prof. N. Shanti Kokila


चक्रव्यूह

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कभी इंद्रधनुष आ जाता है,

कभी तृष्णा सपने बोती है।

है जाल शिकारी लिए हुए,

मछली-सा इसे फसाने को।

कुछ भ्रष्ट शक्तियाँ आतुर है,

सत पथ से इसे हटाने को।

इस चक्रव्यूह से बाहर अब,

निकले कैसे लाचारी है।

है चारों ओर धनुर्धारी,

जो घातक अत्याचारी है।

उनके होठों पर कुटिल हँसी,

हिंसा लख करुणा रोती है।


अँधियारे में जन्मे है हम,

अँधियारे में मरना होगा।

ऐसा लगता इस जीवन को,

विद्रोह बड़ा करना होगा।

यह जीवन सुरभित हो अपना,

पुष्पों में जैसे गंध बसी।

सब छोड़ कपट छल कामुकता,

पावन जीवन उन्मुक्त हँसी।

ऐसी वर्षा कुछ मेघों से,

बस कभी-कभी हो जाती है।


- प्रो० एन० शान्ति कोकिला

बैंगलोर, कर्नाटक

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