दर्द बिछोह का - by Ashima varshney 'Raj'


दर्द बिछोह का

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बह रही शीतल मंद बयार,

प्रीत का छेड़ रही है तार।

हृदय में शूल-सा चुभता है,

भीतर कुछ टूट चटकता है।


जब दर्द बिछोह का उठता है,

कुछ भी भला नहीं लगता है।


नभ में कारे बदरा छाए,

बिजुरी मेरा जिया धड़काए।

अंतस भीग कर सुलगता है,

बूँद बन संताप टपकता है।


जब दर्द बिछोह का उठता है,

कुछ भी भला नहीं लगता है।


संध्या की चुनरी लहराई,

क्षितिज पर है लाली छाई।

खग वृंद पंख पसार चले,

हैया सजना की राह तके।


जब दर्द बिछोह का उठता है,

कुछ भी भला नहीं लगता है।


चंदनिया जब अगन लगाए,

नैना तब तुहिनकण छलकाए।

टीस का ज्वार उमड़ता है,

दरसन को मन तरसता है।


जब दर्द बिछोह का उठता है, 

कुछ भी भला नहीं लगता है।


- आशिमा वार्ष्णेय 'राज'

बैंगलोर, कर्नाटक

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